एमजे अकबर
प्रवक्ता, भाजपा
आगामी बिहार विधासभा चुनाव में रुझान सबसे बुनियादी सवाल पर निर्भर करेगा : राज्य में कौन एक स्थायी सरकार दे सकता है, जो सुशासन के लिए अपरिहार्य शर्त है? एक बहुत लंबी अवधि की अस्थिरता की बड़ी कीमत बिहार को चुकानी पड़ी है.
शेक्सपियर के बाद बेहतरीन अंगरेजी नाटककार माने जानेवाले जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने लिखा है कि विवाह-संस्था इसलिए बनी हुई है क्योंकि हमारे पास तलाक के शानदार कानून हैं. उनकी यह बात 2015 के बिहार चुनाव पर बिल्कुल सही बैठती है.
नीतीश कुमार और लालू यादव के बीच धूम-धड़ाके से हुई शादी शॉ की इस समझ को भी पुष्ट करते हैं : कुछ शादियों में पहले से ही तलाक का प्रावधान नियत कर दिया जाता है. यह भी मानना होगा कि लालू किसी भ्रम में नहीं हैं. उन्होंने पीड़ा के साथ यह कहकर उत्सवी माहौल को थोड़ा उदास कर दिया कि इस विवाह के भोज में उन्होंने जहर पीया है.
अगर आप नीतीश कुमार की राजनीति के निहितार्थों को समझते हैं, तो समस्या बहुत अधिक जटिल नहीं है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि बारात कहां से शुरू हुई और कहां तक जायेगी, पर हर हालत में दुल्हा नीतीश कुमार को ही होना है, अन्यथा कोई शादी ही नहीं होगी.
राजनीति में इस तरह के दावों को आधार जमीनी हकीकत से ही मिल सकता है. बिहार का वर्तमान परिदृश्य बहुत सिमटा हुआ है : नीतीश बिना पार्टी के नेता हैं, और चारा घोटाले में लालू यादव के दंडित होने के कारण उनकी पार्टी का नेता नहीं है. व्यावहारिक आधार पर उनका समझौता इसी स्थिति का परिणाम है. यादव को वोट लाने का भारी काम करना है, जबकि नीतीश कुमार को बस सबसे बड़ा पद ग्रहण कर लेना है.
इसलिए दूल्हा नीतीश कुमार चढ़ने के लिए हमेशा ही किसी और के घोड़े की ताक में लगे रहते हैं. अकेले वे कहीं जा सकने की स्थिति में नहीं हैं. डेढ़ दशकों तक उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को घोड़े के रूप में इस्तेमाल किया और खूब मौज उड़ायी. पटना में मुख्यमंत्री बनने से पहले वे दिल्ली में कैबिनेट मंत्री के रूप में मजा कर रहे थे.
वर्ष 2013 में उन्हें यह भ्रम हुआ कि अगले साल वे देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं, तो उन्होंने बिना किसी अपराध-बोध के भाजपा को धोखा दे दिया. लालू यादव को अच्छी तरह मालूम है कि भाजपा को धोखा देने में कुमार को अगर 15 साल लगे, तो यादव को छोड़ने में उन्हें 15 दिन भी नहीं लगेगा. लालू को अपना इस्तेमाल हो जाने के बाद धकियाये जाने की आशंका है.
एक लंबा खेल शुरू हो चुका है. दोनों सहयोगी सीटों के बंटवारे में अपना हिस्सा अधिक रखकर अपने हितों की रक्षा के लिए तत्पर हैं. किसी जंगल में झाड़ियों की भरमार की तरह मीडिया में चालाकी से छोटी-छोटी खबरें छपवायी जा रही हैं. इसमें सबसे दिलचस्प खबर नीतीश कुमार के खेमे से डाली गयी है कि बरबाद हो चुकी कांग्रेस भी इस जुगाड़ का हिस्सा बनेगी.
ओपिनियन पोल अभी कांग्रेस को दो से पांच सीटें दे रहे हैं, लेकिन पार्टी की महत्वाकांक्षाएं इससे कहीं बड़ी हैं. यह पार्टी करीब 60 सीटों पर लड़ना चाहती है. इतनी सीटें आयेंगी कहां से? नीतीश की ओर से कहानी बनानेवाले संकेत दे रहे हैं कि ये वो सीटें होंगी जिन्हें पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जीता है.
अच्छी चतुराई है. पिछले चुनाव में नीतीश भाजपा के सहयोगी थे. कहने का मतलब यह है कि पांच साल पहले जीती गयी अपनी कोई भी सीट वे छोड़ना नहीं चाहते हैं, लेकिन उन सीटों को लेकर वे बहुत उदार हैं, जहां लालू यादव की पार्टी दूसरे स्थान पर रही थी और इस कारण इन सीटों पर उसका दावा उचित है. निश्चित रूप से अनुभवी लालू यादव को बेवकूफ बनाना आसान नहीं है. उस खबर पर उतना ही भरोसा किया जा सकता है, जितना कि बनायी गयी उस अन्य कहानी पर कि इस समझौते के पीछे राहुल गांधी का दिमाग है.
इस खबर पर भरोसा करने के लिए आपका अपना दिमाग बिल्कुल सुन्न होना चाहिए कि लालू यादव और नीतीश कुमार को अपने हितों के लिए राहुल गांधी के निर्देश की जरूरत है. लेकिन, चुनाव के माहौल में मीडिया में इस तरह की खेती होती रहती है. इस मसले पर अभी कोई टिप्पणी करना पुरानी भूल को दोहराना होगा. चुनाव गणित नहीं होते. आगामी बिहार विधासभा चुनाव में रुझान सबसे बुनियादी सवाल पर निर्भर करेगा : राज्य में कौन एक स्थायी सरकार दे सकता है, जो सुशासन के लिए अपरिहार्य शर्त है?
एक बहुत लंबी अवधि की अस्थिरता की बड़ी कीमत बिहार को चुकानी पड़ी है. लालू यादव को स्थायी जनादेश मिला था, पर वे अच्छा शासन देने में नाकाम रहे. नीतीश कुमार द्वारा तोड़े जाने से पहले नीतीश कुमार-भाजपा गंठबधन ने स्थायित्व और सुशासन दिया.
बिहार का यह चुनाव राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण बदलावों के बाद पहला चुनाव होगा : राष्ट्रीय नेता के तौर पर नरेंद्र मोदी का उभार, अपने शत्रु लालू यादव से नीतीश कुमार का मुश्किल भरा जुड़ाव, नीतीश कुमार द्वारा जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाना और फिर हटा देना, मुख्यमंत्री पद की दौड़ से लालू यादव का हटना और उनकी अगली पीढ़ी के हाथ में बागडोर आना. सहजता से माहौल को समझने में मुश्किल ही लोकतंत्र को एक अजीब दिलचस्प प्रक्रि या बनाता है.
