बिहार और झारखंड में बैंकों से कर्ज लेकर उसे चुकता नहीं करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है. इस वजह से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की गैर निष्पादित आस्तियों (एनपीए) का स्तर जिस तरह बढ़ रहा है, वह न केवल बैंकों की सेहत, बल्कि दोनों राज्यों की अर्थव्यवस्था के लिए भी चिंता करने वाला मसला है. कर्ज न लौटाने के मामले में दोनों राज्यों की स्थिति एक जैसी है.
छोटे-मोटे कजर्दार तो बैंकों को रकम चुकता कर देते हैं, लेकिन भारी भरकम कर्ज लेने वाली कॉरपोरेट कंपनियां या रसूखदार लोग बैंकों को मूल की कौन कहे, सूद भी नहीं लौटा रहे हैं.
बिहार में एनपीए का स्तर 5.77 फीसदी और झारखंड में 5.59 फीसदी है. यह राष्ट्रीय औसत 4.84 फीसदी और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा तय मानक तीन फीसदी से कहीं बहुत ज्यादा है. दोनों राज्यों के बैंकों के आंकड़ों को समेकित रूप से देखा जाये, तो करीब चार हजार करोड़ रुपये डूबने के कगार पर हैं. यह स्थिति सचमुच खतरनाक है.
1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पक्ष में तर्क दिया गया था कि बैंकों में जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा जमा है, जबकि उनका इस्तेमाल बड़े औद्योगिक घरानों के हित में होता है. एनपीए के बढ़ते स्तर को इस तर्क के तराजू पर तौलने की जरूरत है. बैंकों में आम आदमी के खून-पसीने की कमाई जमा होती है, जिसे बैंक कर्ज के रूप में देते हैं.
आखिर मेहनत के बल पर इकट्ठा की गयी व्यापक जनता की कमाई को मुट्ठी भर रसूखदार लोगों के पास क्यों छोड़ा जाना चाहिए? बैंक और वित्तीय संस्थाओं को नुकसान पहुंचेगा, तो इसका सीधा असर राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. एनपीए का स्तर बढ़ेगा, तो बैंक नये कर्ज देने पर अंकुश लगायेंगे.
फिर औद्योगिक निवेश प्रभावित होगा. छोटे कारोबारियों और जरूरतमंद आम लोगों को इसकी कीमत चुकानी होगी. डूबते कर्ज के मर्ज से उबरने के लिए बैंकों को राज्य सरकारों के सहयोग से समय रहते कड़े फैसले लेने होंगे.
करोड़ों के कजर्दार लोग कानूनी दावं-पेंच का सहारा लेकर अक्सर बच जाते हैं. ऐसे में यदि यह मांग उठ रही है कि जानबूझ कर कर्ज न लौटानेवालों के खिलाफ फौजदारी का मामला दर्ज कर कजर्दारों की संपत्ति बिक्री की प्रक्रिया आसान बनायी जाये, तो यह कहीं से अनुचित व अप्रासंगिक नहीं है.
