शैलेष भारतवासी
संपादक, हिंद युग्म प्रकाशन
साहित्यिक हिंदी किताबों की हजार-डेढ़ हजार प्रतियां बिकना एक बड़ी घटना मानी जाने लगी है. 50 करोड़ से अधिक आबादी के हिंदी भाषी समाज में किताबों की यह व्याप्ति अपने-आप में सवाल और संकट दोनों है.
हिंदी में हर साल लगभग छ: हजार से दस हजार तरह किताबें छपती हैं, जिनमें 10-12 किताबें ही 1,000 से अधिक की पाठकीय बिक्री का आंकड़ा छू पाती हैं. संस्थागत और पुस्तकालय खरीद से अलग हिंदी किताबों की कोई दुनिया नहीं है.
इसलिए पिछले तीन वर्षो से हमने 1,000 से 5,000 तक की बिक्री संख्या का उत्सव मनाया. 1,000-1,500 प्रतियों की प्रीबुकिंग को अभूतपूर्व बताया. हिंद युग्म के ज्यादातर लेखक ऐसे थे, जिनकी लेखन की दुनिया में लोकप्रियता किताब के आने से पहले लगभग शून्य थी. यानी किताबों ने अपने पाठक जोड़े और लेखकों ने पाठकों की लोकप्रियता पायी.
इस साल के शुरू में रवीश कुमार की किताब आयी और उसकी 2,000 से 10,000 प्रतियों के बिकने का दावा किया गया और उसका खूब सेलिब्रेशन हुआ. यह सेलिब्रेशन कई तरह के खतरे की ओर भी संकेत करता है. हिंदी किताबों के कम बिकने के पीछे आमतौर पर खराब डिस्ट्रीब्यूशन, प्रचार-प्रसार का अभाव बताया जाता है.
लेकिन यदि हम हिंदी की पिछले 2-3 वर्षो में आयी सबसे ज्यादा बिकनेवाली किताब ‘इश्क में शहर होना’ की ऑनलाइन स्टोर अमेजॉन पर किताबों के बिक्री दर के हिसाब से बनी लोकप्रियता सूची में स्थिति देखें और उसकी तुलना अंगरेजी पॉपुलर फिक्शन के हीरो अमीश त्रिपाठी की आनेवाली किताब ‘सायन ऑफ इक्ष्वाकु’ के हिंदी संस्करण ‘इक्ष्वाकु के वंशज’ से करें, तो पायेंगे कि रवीश की किताब की लोकप्रियता अमीश की किताब के हिंदी संस्करण से कम है.
हम यहां कमजोर डिस्ट्रीब्यूशन का रोना भी नहीं रो सकते, क्योंकि ‘इक्ष्वाकु के वंशज’ की अभी केवल ऑनलाइन प्रीबुकिंग चल रही है. यानी किताब अभी छपी भी नहीं है. रवीश की किताब को हिंदी की पत्र-पत्रिकाओं में जितना स्थान मिला, उतना अमीश की हिंदी किताब को नहीं मिला. और ना ही हमारा जो लेखक और पाठक समाज है, जो हमसे फेसबुक पर जुड़े हैं, उनके द्वारा अमीश की हिंदी किताब को खरीद कर उत्साह में फेसबुक पर स्टेटस चढ़ाते देखा.
अंगरेजी के अखबारों में अमीश के इंटरव्यू जरूर आ रहे हैं और अंगरेजी अखबारों-पत्रिकाओं में ‘सायन ऑफ इक्ष्वाकु’ के आने की धमक है. अब सवाल उठता है कि अमीश की हिंदी किताब को हजारों की संख्या में पाठक कहां से मिल रहे हैं!
एनडीटीवी के रवीश कुमार हिंदी के लगभग लोकप्रियतम व्यक्ति हैं. अखबारों-पत्रिकाओं में भी दिखाई देते हैं. यानी रवीश की किताब का 10 हजार बिकना हमारी लेखन बिरादरी के अधिकतम थ्रेशहोल्ड की तरफ इशारा करता है.
यानी हिंदी की मौलिक किताबों का न बिकना इतनी आसान गुत्थी भी नहीं है. सवाल यह है कि क्या हिंदी के पास ऐसा कंटेंट ही नहीं है, जो बिकाऊ हो? क्या हिंदी का लेखक बिकने के लिए लिख ही नहीं रहा? क्या हिंदी का लेखक और प्रकाशक बिकनेवाली सामग्री का चुनाव नहीं कर पा रहा? जरा सोच कर देखिए..
