नक्सल समस्या पश्चिम बंगाल के नक्सलवाड़ी गांव से शुरू होकर देश के कोने-कोने तक अपना पैर फैला खुका है. इसकी जड़ें इतनी गहरी और मजबूत हो गयी हैं कि केंद्र व राज्य सरकारों के चेहरे पर इस जटिलता का शिकन साफ दिखाई देता है.
कमोवेश उग्रवाद पर काबू पाने की हर मुमकिन सरकारी कोशिश नाकाम साबित हो रही है और परिणाम शून्य है. इससे यह कयास लगाया जाना चाहिए कि माओवादी कितने मजबूत और विस्तृत हो चुके हैं.
हालांकि, इन्हें हल्के में लेना व आंखें तरेर कर बंदूक की नोक पर काबू पाये जाने का प्रयास किया जाना ख्याली पुलाव ही साबित होगा. अतएव सरकार को चाहिए कि इन भ्रमित युवाओं को वार्ता के लिए आमंत्रित करे तथा माओवादियों को भी चाहिए कि वे अपने रुख में लचीलापन लाते हुए सरकार के समीप पहुंचने का कोई सार्थक विकल्प ढूंढ़ निकाले, ताकि एक मेज पर बैठ कर विचारों का आदान-प्रदान से शायद समस्या का कोई हल निकाला जा सके.
यहां दोनों पक्षों को गौर करने की जरूरत है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं कोई त्रुटियां तो है? तभी तो माओवादियों को न मंजिल मिल रही है और न ही सरकार उस पर नियंत्रण ही कर पा रही है. नतीजतन, इसका नुकसान देश और राज्य के नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है. इसलिए दोनों के बीच इस द्वंद्व को प्रतिष्ठा का विषय न बनाया जाए. नक्सलियों को भो सोचना होगा कि हिंसक गतिविधियों से समाज नहीं बदल सकता है.
सरकार और नक्सली दोनों यह जान लें कि कि बंदूक कभी भी किसी समस्या का हल नहीं हो सकता है. आम लोगों की समस्या का त्वरित समाधान ही एकमात्र रास्ता है. सरकार अपने तंत्र को चुस्त-दुरुस्त करे.
बैजनाथ प्रसाद महतो, हुरलुंग, बोकारो
