गिरीन्द्र नाथ झा
किसान
क्या आपने मड़ुआ के बारे में सुना है? अरे वही मड़ुआ, जिसके बारे में कभी आप सुन कर ही नाक-भौं टेढ़ा कर लेते थे. इस अनाज के काले रंग के आंटा के बारे में भी लोग सुनना नहीं चाहते थे. इसको 10 साल पहले तक लोग-बाग पूछते भी नहीं थे, लेकिन पिछले कुछ साल से इसने गजब तरीके से वापसी की है. इस वापसी के मायने को समझने की जरूरत है.
कभी मड़ुआ की खेती के बारे में भी लोग सोच नहीं सकते थे, क्योंकि इसका कोई मूल्य ही नहीं होता था. ऐसे में अचानक क्या हुआ कि किसानी कर रहे लोग खेती के लिए मड़ुआ का बीज खोजने लगे हैं. एक किसान के तौर पर मैं खुद पूसा और सबौर का चक्कर लगा चुका हूं, ताकि मड़ुआ का बीज मिल जाये, लेकिन मैं असफल ही रहा.
बिहार में मड़ुआ को लेकर अभी भी नजरिया पुराना ही है, लेकिन उत्तराखंड में तो मड़ुआ का बहुत महत्व है. दरअसल, मड़ुआ पोषक तत्वों से भरा है. आपको जान कर ताज्जुब होगा कि उत्तराखंड से मड़ुआ जापान जाता है और वहां इससे बेबी फूड तैयार होता है. ऐसे में बिहार झारखंड और अन्य राज्यों के किसानों को मड़ुआ को लेकर नये सिरे से सोचने की जरूरत है.
यह तो हुई विदेश के बाजार की बात. अब जानिये रोग के लिए मड़ुआ का महत्व. दरसअल, जिस तेजी से हम डाइबिटिक (मधुमेह) हो रहे हैं, इसमें मड़ुआ का सेवन रामबाण साबित होता है. डॉक्टर इसका सेवन करने के लिए कहते हैं. इसका बिस्कुट बनने लगा है. तो ऐसे में हमारे किसान इसे उगाने में हाथ क्यों नहीं आजमा रहे हैं, सुन कर अचरज होता है.
यदि आप पोखर बना रहे हैं, तो उसके मेड़ पर आप मड़ुआ उपजा सकते हैं. मड़ुआ जमीन को समतल भी करता है, खासकर बलुआही जमीन को. यह कम दिन का फसल है, लेकिन समस्या बीज की उपलब्धता को लेकर है. बीज नहीं मिलने के कारण उन किसानों को दिक्कत हो रही है, जो इसकी खेती के लिए मन बना चुके हैं. खेती को लेकर प्रयोगधर्मी बनने की जरूरत है.
कुछ नया करिये. जिस फसल को आप अब तक पूछ नहीं रहे थे, उसका कितना बड़ा बाजार बन गया है, इस पर सोचिये और खेत को मड़ुआ के लिए तैयार करिये.
दरअसल, जीवन की तरह ही फसलों का अपना चक्र होता है. फसल भी अपने जीवन में उतार-चढ़ाव देखती है. ऐसे में मड़ुआ से शानदार उदाहरण आपको कम ही देखने को मिलेगा.
आप यह सोचिए न, कि जिस अनाज को आप काला या दबा-कुचला मान कर पूछते नहीं थे, उस पर आज आपको सोचना पड़ रहा है. यह जीवन के उस चक्र की तरह है, जिसमें कहा जाता है कि सब दिन होत न एक समाना.. मतलब हर एक का दिन आता है.
मड़ुआ को अब तक हम सब ने जिस नजर से देखा, अब उस नजर को बदलने की जरूरत है. गांव के खेतों को बाजार के लिए हम तैयार करते आये हैं, अब बारी है कि उन खेतों को बाजार के संग पारंपरिक खेती के साथ भी जोड़ कर देखें. आइये इसके लिए थोड़ा हट कर सोचते हैं और मड़ुआ जैसे अनाज की घर वापसी करते हैं.
