सरकार जनता के प्रति जवाबदेह हो

सरकार विभिन्न प्रदर्शनों के दौरान सरकारी व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाये जाने पर बने कानून को और कड़ा करने जा रही है तथा ऐसे आयोजन करनेवाले संगठनों की जिम्मेदारियां भी तय कर रही है, लेकिन क्या सरकार इसके लिए खुद की भी कोई जिम्मदारी तय कर रही है या अपने अफसरों को जनता के […]

सरकार विभिन्न प्रदर्शनों के दौरान सरकारी व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाये जाने पर बने कानून को और कड़ा करने जा रही है तथा ऐसे आयोजन करनेवाले संगठनों की जिम्मेदारियां भी तय कर रही है, लेकिन क्या सरकार इसके लिए खुद की भी कोई जिम्मदारी तय कर रही है या अपने अफसरों को जनता के प्रति जवाबदेह बना रही है, उनकी समस्याओं के त्वरित निराकरण के लिए प्रशासन को और चुस्त-दुरुस्त कर रही है.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर लोग आंदोलन करने पर मजबूर ही क्यों होते हैं? क्या इन सबके लिए सरकार खुद भी जिम्मेदार नहीं? कहीं न कहीं लोगों के मन में आज ये बात घर कर गयी है कि ऐसा किये बिना उनकी आवाज सरकार तक पहुंच ही नहीं सकती. उदाहरणार्थ, मणिपुर में पिछले 14 वर्ष से इरोम शर्मिला भूख हड़ताल पर हैं, मगर उनकी ओर सरकार का ध्यान नहीं है.
वर्ष 2012 में मध्यप्रदेश के जल सत्याग्रह नामक अहिंसात्मक आंदोलन में 51 महिला-पुरुष अपनी मांगों को लेकर 17 दिनों तक जलमग्न रहे थे, मगर कोई उनकी सुध लेनेवाला तक नहीं था. उनके पैर सड़ गये, पानी गर्दन तक आ गया, तब कहीं जाकर सरकार होश आयी. वहीं, आरक्षण दिये जाने के नाम पर राजस्थान के गुर्जर आंदोलन में रेलवे ट्रैक उखाड़ दिये जाते हैं, तो सरकार के कानों तक भी आवाज तुरंत पहुंच जाती है और मामले का निष्पादन भी तुरंत ही हो जाता है.
क्या ऐसे कड़े कानून के साथ-साथ ऐसा कोई प्रावधान या एक ऐसे आयोग का गठन भी नहीं होना जरूरी नहीं है, जो ऐसे मामलों में न सिर्फ त्वरित सुनवाई करे, बल्कि तत्काल निर्णय लेते हुए उचित फैसला भी दे. फिर, शायद किसी को ऐसे आंदोलन करने की जरूरत ही न पड़े.
प्रसेनजीत महतो, बासुड़दा, सरायकेला

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