आम आदमी पार्टी द्वारा जल्दबाजी में कच्ची-पीली ईंटों से बनाये गये मकान का हश्र यही होना ही था, क्योंकि कोई भी मकान बिना मजबूत और अच्छी ईंटों की बुनियाद के कभी मजबूत नहीं हो सकता. यह पार्टी भी उसी दिन अन्य पार्टियों की लाइन में ही आ चुकी थी, जब अच्छाई और ईमानदारी की जगह चंदे आदि के लोभ में टिकट और पार्टी पद दिये जाने लगे. पार्टी में कुछ अच्छे लोगों ने विरोध करते हुए जांच की बात की, मगर उन्हें तानाशाही तरीके से अपमानित कर तुरंत निकल दिया गया. यह कितने शर्म की बात है.
आलोचकों, सुधारकों और विरोधियों का तो सदा लोकतंत्र में सम्मान मिलता रहा है, मगर यहां तो जिस मीडिया ने उसे इस ऊंचाई तक पहुंचाया था, उसे ही धमिकयां तक भी दी गयीं. अब इस पार्टी की भी कलई पूरी तरह से खुल चुकी है.
वेद, मामूरपुर, नरेला
