रूखे एवं बेतरतीब ढंग से बने बाल, पांव में गरीबी की झलक, झोले एवं प्लास्टिक में समाये बस्ते को कंधे पर लटकाये स्कूल की वर्दी में भागते बालक दुनिया की खबरों से पूरी तरह बेखबर रहते हैं. हमारे देश के आधे से अधिक नौनिहाल गांवों में निवास करते हैं एवं हर परिस्थति को ङोल कर अपना भविष्य संवारने में जुटे हैं.
इन बच्चों को देख कर मन में सवाल पैदा होता है कि यदि इनके स्थान पर निजी स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चे होते, तो स्कूली माहौल कैसा होता? उनके स्कूल यूनिफार्म एवं भवनों में गजब की चमक होती.
उनके चेहरे एवं व्यवहार में चकित करनेवाला तेज होता. वे देश-दुनिया में होनेवाले तकनीकी और अन्य परिवर्तनों से पूरी तरह से परिचित होते. लेकिन तथाकथित तौर पर इतनी अधिक सरकारी सुविधाएं मिलने के बाद भी वे इन चीजों से अनभिज्ञ क्यों हैं? आखिर उनके चेहरे से ऐसा क्यों झलकता है कि उन्हें जीवन-यापन करने लायक भी शिक्षा नहीं दी जा रही है.
क्या हम और हमारी सरकारें ऐसे ही देश के भविष्य का निर्माण कर रहे हैं? क्या सरकार और उनके अधीन काम करनेवाले अधिकारीगण खुद के बच्चों के लिए ऐसी ही शिक्षा व्यवस्था चाहते हैं? यदि नहीं, तो फिर क्यों वे देश के गरीब बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं? उन्हें गुणात्मक शिक्षा क्यों नहीं मुहैया करायी जा रही है? उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता है. आज देश राजनीति का अखाड़ा बन गया है.
कोई भी क्षेत्र इसके प्रभाव से अछूता नहीं है. यही राजनीति देश के नौनिहालों का भविष्य बिगाड़ रही है. आज सरकार व उससे बाहर के लोग अपनी और आनेवाली पीढ़ी का वर्चस्व बनाये रखने की राजनीति की जा रही है, जो भविष्य के लिए घातक है.
आलिया अंजुम, घाटो बगीचा, गुमला
