बात चाहे सड़क दुर्घटना की हो या कोई घरेलू दुर्घटना, गौर करने पर हमें पता चलता है कि सबकी जड़ में कहीं न कहीं लापरवाही की बड़ी भूमिका होती है. इस बात से कोई कतई इनकार नहीं कर सकता कि दुर्घटना के बाद जागने की हमारी पुरानी आदत है.
जब तक ठेस ना लगे, हम अपनी आंखें खोल कर किसी भी मुद्दे पर विचार-विमर्श नहीं करते. ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ की कहावत हम अक्सर कहने से नहीं चूकते, पर कभी इस बात पर गौर ही नहीं करते कि आखिर यह विनाशी पल आया कैसे और इसको लानेवाला कौन है?
हम सब यह भी बखूबी जानते हैं कि ज्यादातर समस्याएं हमारी लापरवाहियों का ही परिणाम होती हैं. कहने को तो हम शिक्षित हैं, पर अपनी आदतों से लाचार हैं. ऐसे में दुर्घटनाओं को कम करने के लिए हमें अपनी आदतें सुधारनी होंगी.
प्रीति सिंह, रांची
