पी के चौधरी
संस्थापक सदस्य,
इंडिया फॉर डेमोक्रेसी
किसानों की जमीन पर उद्योग लगते हैं, तो उससे होनेवाले लाभ का एक फीसदी किसान को भी दिया जाये, और यह रकम उसे एक बांड के रूप में लंबे समय तक दिया जाये, तभी किसान की क्रय क्षमता बढ़ेगी.
देश में भूमि अधिग्रहण के सवाल पर कई तरह के विमर्श चल रहे हैं. इसके लिए कोई भाजपा सरकार को दोषी ठहरा रहा है, तो कोई कांग्रेस को. लेकिन हमें भूमि अधिग्रहण के मसले को मोदी सरकार या कांग्रेस सरकार से जोड़ कर नहीं देखते हुए इसे व्यवस्थागत सोच और इससे जुड़े पेंच के तर्ज पर समझना चाहिए.
दोनों ही राजनीतिक पार्टियों में ऐसे लोग हैं, जो कॉरपोरेट के साथ मिल कर भूमि पर अधिकार करना चाहते हैं. भूमि अधिग्रहण का सवाल बाजार अर्थव्यवस्था के विकास के साथ जुड़ा हुआ है.
सोवियत संघ में 1930-32 में प्रोवेजेंसकी और बुखारिन के बीच बहस हुई. बुखारिन का जोर था कि बाहरी उद्योग पर जोर न देकर किसानों का पर्चेजिंग पावर बढ़े. जबकि प्रोवेजेंसकी का मानना था कि औद्योगिकरण के लिए पूंजी निर्माण आंतरिक उपनिवेशिकरण से हासिल हो.
उनका कहना था कि खेती ही ऐसा साधन हो सकता है, जहां से संसाधन जुटाया जा सकता है. इसके लिए दो तरीके हो सकते हैं. एक तो टैक्स लगा कर, लेकिन टैक्स लगाने पर भ्रष्टाचार बढ़ेगा. दूसरा, खेती के सामान को सस्ता खरीद कर और औद्योगिक वस्तु को महंगा बेच कर. इसके जरिये बिना किसी ऋण के पूंजी जुटायी जा सकती है.
नेहरू ने पंचवर्षीय योजना के जरिये आंतरिक उपनिवेशवाद की थ्योरी को आत्मसात किया था. हमें खेती के सामान को सस्ता खरीदना है और औद्योगिक वस्तु को महंगा बेचना है. विभिन्न आंदोलनों में अग्रणी भूमिका निभा चुके बीडी शर्मा ने एक अध्ययन में कहा है कि सरकार भारत के प्रत्येक गांव से एक करोड़ रुपया निकालती है. यदि 6 लाख भारतीय गांवों को 6 लाख करोड़ दे दिया जाये, तो गांव का भला हो जाये.
पिछली सरकार में मनरेगा के जरिये कम से कम 50-60 हजार करोड़ रुपया गांवों में जाता था. लेकिन यह सरकार यथास्थितिवादी है.
इसे लगता है कि यह पैसा भी बर्बाद न हो, इसलिए वह इसे भी बचाना चाहती है. कांग्रेस इस पैसे को गांव में खर्च करना चाहती थी. लेकिन वर्तमान सरकार मॉडल विलेज और ग्राम विकास की बात तो कर रही है, लेकिन सामाजिक प्रक्षेत्र की योजनाओं में कटौती भी कर रही है. कृषि उत्पादों की कीमत को तो बाजार के नियंत्रण के हवाले छोड़ ही दिया गया है. इससे आगे बढ़ते हुए अब भूमि संबंधी नियम को बदलने की कवायद की जा रही है. कोशिश हो रही है कि कॉरपोरेट प्रत्यक्ष तौर पर खेती के काम में लग जाये और किसानों को परंपरागत खेती से अलग किया जाये.
विकास के नाम पर तरह-तरह के फूड कॉरपोरेशन, फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन, बीज निगम, बनाये जा रहे हैं. आगे चल कर प्याज कॉरपोरेशन, खीरा कॉरपोरेशन जैसी चीजें भी दिखायी देंगी. जैसे कर्नाटक में ग्रीन गोल्ड हजारों बीघे में खीरा की खेती करता है, वही खीरा दिल्ली में भी मिलता है, जो हमारे देशी खीरे से बिल्कुल अलग है.
इसके साथ ही भौतिक रूप से जमीन पर अधिकार की चाहत रखते हुए कॉरपोरेट बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण करेगा. लेकिन यह प्रक्रिया इतनी सरल नहीं होगी. खेती की जमीन यदि सरकार किसानों से ले लेगी, तो फिर उसका पर्चेजिंग पावर कम हो जायेगा.
जगह-जगह पर सरकार को प्रतिरोध का भी सामना करना होगा. इसीलिए सरकार भूमि अधिग्रहण के मसले पर आगे-पीछे करती हुई चल रही है. अब सरकार के सामने समस्या है कि किसानों के पर्चेजिंग पावर को कैसे बनाये रखे. किसानों को भी समझना होगा कि अकेले उनके लिए खेती करना संभव नहीं है. कॉरपोरेशन से लड़ने के लिए उन्हें कोऑपरेटिव की जरूरत होगी, तभी खेती लाभकारी हो सकती है. उन्हें खेती में बने रहने के लिए बाजार की ताकतों से मुकाबला करना होगा.
भूमि अधिग्रहण का मसला बढ़ते शहरीकरण, उपभोक्तावाद और संस्कृति से जुड़ा हुआ है. किसान भी चाहता है कि उसे एक सुनिश्चित सैलरी मिले. बाढ़-सूखा का उसके जीवन पर असर न हो. उसकी भी इच्छा है कि उपभोक्तावादी जमात में वह शामिल हो. उसे शिकायत इस बात से नहीं है कि उसकी जमीन ले ली गयी, बल्कि शिकायत यह है कि उसे उचित दाम मिले, उपक्रमों में उनकी स्थाई हिस्सेदारी हो. मुआवजे की राशि को बढ़ा कर यदि औद्योगिक घराने किसानों से जमीन हासिल कर लेते हैं, तब भी यह सौदा लाभ का है. वे इस पैसे को बाजार में ही लायेंगे, और इससे विकास की प्रक्रिया बढ़ेगी.
लेकिन इस पैसे से किसानों के जीवन में बदलाव आयेगा, यह जरूरी नहीं है. यह तभी संभव होगा जब जमीन से मुआवजे के रूप में मिलनेवाली रकम का एक हिस्सा निवेश के तौर पर मिले. उसकी जमीन पर जो उद्योग लगते हैं, उससे होनेवाले लाभ का एक फीसदी किसान को भी दिया जाये, और यह रकम उसे एक बांड के रूप में लंबे समय तक दिया जाये, तभी किसान की क्रय क्षमता बढ़ने के साथ ही वह अपने लिए संपत्ति सृजन भी कर सकेगा.
