जिस इम्तहान में मात्र ढाई हजार सीटों के लिए छह लाख से ज्यादा प्रतिभागियों के बीच प्रतियोगिता हो, उसमें कदाचार की आशंका हमेशा बनी रहेगी, खास कर उस स्थिति में जब सफलता देश व दुनिया के अभिजन तबके में शामिल होने के गारंटीपत्र सरीखा हो. ऑल इंडिया प्री-मेडिकल मेडिकल टेस्ट ऐसा ही इम्तहान है.
इस इम्तहान को पास करने का अर्थ है सर्वाधिक मांग, मेहनताने और इज्जत वाले कौशल को अर्जित करने की कुंजी हासिल कर लेना. ज्यादातर लोग इसे पढ़ाई-लिखाई के बूते हासिल करना चाहते हैं, लेकिन कुछ लोग अन्य तौर-तरीके भी अपनाते हैं. मई के शुरू में हुए इस इम्तहान में ऐसे ही लोगों ने परीक्षा शब्द में निहित पवित्रता को भंग करने की कोशिश की और हरियाणा पुलिस ने जब उनमें से कुछ को पकड़ा, तो उनके अंतर्वस्त्रों में सिम कार्ड, ब्लू टूथ और डिजीटल घड़ी जैसेअत्याधुनिक उपकरण तो मिले ही, इन उपकरणों में छुपे परीक्षा के कुल 180 सवालों में 123 सवालों के सही जवाब भी मिले.
मामला अदालत में है और कई संस्थाओं और वर्गो के हित आपस में टकरा रहे हैं. पुलिस को लगता है कि वह कदाचार में लिप्त लोगों की सही संख्या कभी पता ही नहीं कर सकती क्योंकि सूचना प्रौद्योगिकी के इस जमाने में पलक झपकते किसी सूचना का व्यापक प्रसार हो जाता है.
जो अपने अभिभावकों की गाढ़ी कमाई और सालों की कमरतोड़ पढ़ाई के बाद परीक्षा में बैठे, उन्हें लग रहा है कि परीक्षा का परिणाम जल्दी घोषित हो क्योंकि परीक्षा परिणाम से ही उनके जीवन की भावी दिशा तय होनी है. जो प्रतिष्ठित परीक्षाओं में भ्रष्टाचार की पोल खोलना चाहते हैं, वे परीक्षा दुबारा करवाने के हामी हैं, जबकि अदालत का पक्ष है कि जब तक कदाचार के लाभार्थियों की संख्या का पता नहीं कर लिया जाता, तब तक दुबारा परीक्षा करवाने का फैसला सुनाया ठीक नहीं है.
सबके तर्क अपनी जगह सही हैं, पर वे तात्कालिक समाधान की मंशा से प्रेरित हैं. अदालत का फैसला चाहे जो हो, लेकिन जब तक बेहतर जीविका की गारंटी वाले इम्तहानों की पूरी प्रणाली को आमूल-चूल बदलने के उपाय नहीं कर लिये जाते, तब तक कदाचार को रोकना संभव न होगा और प्रतिभाशाली छात्रों के भविष्य पर ग्रहण लगने की आशंका हमेशा बनी रहेगी.
