पिछले महीने हटिया ग्रिड से जुड़े उपभोक्ताओं को भयंकर बिजली संकट का सामना करना पड़ा. भला हो अखबारों का, जिनकी खबरों ने दबाव भी बनाया, उम्मीदे भी जगायी. बदहाल बिजली व्यवस्था सूबे की पहचान है, जिसे हवा का एक झोका भी भयभीत कर जाता है.
बिजली की एक ‘यूनिट’ न समझ पाने वाले व्यक्ति को इतनी समझ तो जरूर होगी कि बिजली की खींच-खींच से जिदगी दूभर हो गयी है. इसकी आंख-मिचौली आम बात है. फिर भी हर बार एक सवाल जेहन में आता है कि ‘अब क्या’ और ‘कब तक’? जवाब के लिए फिर अगले दिन का अखबार.
यह नयी बात नहीं, मगर जाने क्यों हर पीड़ा पिछली से ज्यादा कष्टदायक होती है. आम आदमी इस ‘अनिवार्य सेवा’ के सामने इतना असहाय नहीं कि खामोश बैठ जाये. अपेक्षा है कि अधिकारी ऐसे विषयों पर स्वत: संज्ञान लेंगे.
एमके मिश्र, रांची
