ऐसे तो भरोसा टूटेगा

अनुज कुमार सिन्हा बाबा भारती की कहानी शायद आपने पढ़ी होगी. उनके पास एक घोड़ा था. बड़ा प्रिय था. एक डकैत खड़ग सिंह को वह घोड़ा पसंद आ गया. उसने बार-बार बाबा से घोड़ा मांगा. नहीं देने पर उसने एक दिन लाचार व्यक्ति का वेश बना कर कंबल ओढ़ कर उस रास्ते पर लेट गया, […]

अनुज कुमार सिन्हा

बाबा भारती की कहानी शायद आपने पढ़ी होगी. उनके पास एक घोड़ा था. बड़ा प्रिय था. एक डकैत खड़ग सिंह को वह घोड़ा पसंद आ गया. उसने बार-बार बाबा से घोड़ा मांगा. नहीं देने पर उसने एक दिन लाचार व्यक्ति का वेश बना कर कंबल ओढ़ कर उस रास्ते पर लेट गया, जिससे बाबा गुजर रहे थे.

बाबा उसे देख कर रुक गये, घोड़े से उतर गये. जैसे ही हाल पूछना चाहा, डकैत ने बाबा से उनका घोड़ा छीन लिया. जब वह भागने लगा तो बाबा ने उसे इतना ही कहा – इस घटना का कहीं जिक्र नहीं करना, वरना लोगों का लाचार-गरीब व्यक्ति पर से भरोसा उठ जायेगा. गुमला में चिकित्सक डॉ आरबी चौधरी को जिस तरीके से ले जाकर अपराधियों ने उनकी हत्या की, बाबा भारती की कहानी याद आ गयी. यह विश्वास और भरोसा का सवाल है.

जो खबरें अब तक आयी हैं, उससे तो यही लगता है कि अपराधी डॉ चौधरी को यह कह कर ले गये थे कि किसी का इलाज करना है. तभी तो इलाज करने के सभी साधन उनके साथ थे, जिसे बाद में अपराधियों ने जला दिया. चिकित्सक को लोग भगवान के बाद का दर्जा तक देते हैं. लेकिन अब समाज में तेजी से बदलाव आया है. मरीज और चिकित्सकों के बीच की दूरियां बढ़ी हैं. बीस साल पहले यह माहौल था, जब एक फोन पर देर रात को भी चिकित्सक अकेले मरीज को देखने निकल जाते थे.

अब ऐसी बात नहीं है. अनेक घटनाएं घटीं जब चिकित्सकों को ले जा कर लूट लिया गया, मारा-पीटा गया. हालात यह बन गये कि अब मरीज चिकित्सक के गेट पर आवाज लगाते रहते हैं, कोई नहीं उठता. इसके बावजूद कुछ ऐसे चिकित्सक हैं (खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में), जो रात हो या दिन, किसी ने याद किया, इलाज करने के लिए जोखिम उठा कर चले जाते हैं. संभव हो डॉ चौधरी भी ऐसे ही चिकित्सक हों.

इलाज के बहाने ले जाकर अपहरण करना, फिरौती मांगना, पैसा भी ले लेना और फिर हत्या कर देना विश्वास को तोड़ना है. इसके दूरगामी प्रभाव होंगे. अब चिकित्सक किसी पर भरोसा नहीं करेंगे. हत्या का असली कारण अभी साफ नहीं हो सका है. इसके कारणों को तलाशना होगा. चिकित्सक की पत्नी ने गंभीर सवाल उठाये हैं. कहती हैं-मीडिया और आंदोलन के दबाव में अपराधियों ने उनके पति की हत्या कर दी.

यह सही है कि यह खबर फैल चुकी थी. प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रॉानिक मीडिया में सुर्खियों में थी. इससे पुलिस पर दबाव बढ़ा था. डॉ चौधरी के करीबी का यह भी आरोप है कि पुलिस के साथ उनके परिजनों की जो बातें हो रही थी, वह पुलिस विभाग से लीक हो रही थी. उनके आरोप में कितना दम है, कहना मुश्किल है, लेकिन अगर कोई चिकित्सक (या कोई भी व्यक्ति) किसी अपराधी के कब्जे में है, तो ऐसे कार्यो से बचना चाहिए, जिससे उनकी जान को खतरा हो. पुलिस अगर सक्रिय होती, तो संभव है कि चिकित्सक की जान बच सकती थी. पुलिस पर लोगों का भरोसा नहीं रहा. वह अपराधियों से बचा नहीं सकती. परिवार के लोगों को खुद संपर्क कर फिरौती देकर अपने परिजनों को रिहा कराना होता है. बाद में श्रेय पुलिस लूटती है.

अब मीडिया-संघ (आंदोलन करनेवाले) के लिए भी सोचने का वक्त है (डॉ चौधरी की पत्नी के आरोप के बाद). एक सीमा के बाद किसी ऐसे संवेदनशील मुद्दे को उछालने का क्या असर हो सकता है. लेकिन यह भी सही है कि मीडिया तो अपना काम करता है.

उसका काम सूचना देना है. संघ भी अगर आंदोलन की धमकी देता है, तो इसलिए ताकि प्रशासन पर दबाव बने. हां, अगर पुलिस विभाग से बातचीत की जानकारी अपराधियों तक पहुंचती है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है. डॉ चौधरी की हत्या झारखंड के हालात को बताता है. खास कर गुमला के. रांची में बैठ कर गुमला या दूर-दराज के इलाकों की कानून-व्यवस्था का आकलन नहीं किया जा सकता है.

जोखिम लेकर वहां लोग काम करते हैं. अब कौन चिकित्सक दिन या रात में किसी मरीज के घर जायेगा. सवाल सुरक्षा का है, सवाल जीवन का है. यही हाल है शिक्षकों का. राज्य में कई शिक्षकों की हत्या हो चुकी है. उनसे भी अपराधी-नक्सली पैसा वसूलते हैं. भयभीत ऐसे शिक्षक-चिकित्सक कैसे अपना दायित्व ईमानदारी से निभा पायेंगे. इसका एक मात्र हल है-राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति सुधारना. अपराधियों के मन में भय पैदा करना, ताकि वे ऐसी घटनाओं को अंजाम नहीं दे सकें.

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