रविवार को एक तरफ झारखंड के बदहाल पतरातू थर्मल पावर प्लांट को देश की सबसे बड़ी सरकारी बिजली कंपनी एनटीपीसी को सौंपने के लिए करार हो रहा था, तो दूसरी तरफ उसी शाम को ‘झारखंड बंद’ से पहले मशाल जुलूस निकाला जा रहा था.
अगले दिन सोमवार को दोपहर बाद जब केंद्रीय कोयला एवं बिजली मंत्री, रेल मंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री एक ‘विशेष उद्देश्य वाहक’ (एसपीवी) के गठन के लिए करार पर दस्तखत कर रहे थे, तो सुबह बंद समर्थक मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण विधेयक के खिलाफ सड़कों पर उतरे हुए थे.
यह एसपीवी झारखंड की कोयला परियोजनाओं के लिए रेट नेटवर्क स्थापित करने के लिए है, ताकि राज्य का कोयला पूरे देश में आसानी से ले जाया जा सके. पीटीपीएस व एसपीवी पर हुए करार को झारखंड सरकार, विकास के लिए तड़पते राज्य के वास्ते ऑक्सीजन बता रही है, तो इसे आशंका भरी नजरों से देखनेवाले भी कम नहीं हैं. यहां यह सवाल लाजिम है कि ‘विकास’ की गतिविधियां राज्य के आदिवासियों, किसानों को डराती क्यों हैं?
तो इसका जवाब है, इनके कड़वे अनुभव. विकास के नाम पर इन्होंने गंवाया ही है, मिला कुछ नहीं. आदिवासियों, किसानों ने अपना जल-जंगल-जमीन और खनिज संपदा गंवायी, और इससे समृद्ध हुए बाहरी लोग. जब तक इस धारणा को नहीं बदला जाता, लोग ‘विकास’ के खिलाफ ही खड़े होंगे. यूपीए सरकार के दौरान, 2013 में जो भूमि अधिग्रहण कानून बना था, उससे झारखंडी जनता कुछ आश्वस्त हुई थी, लेकिन मोदी सरकार जो नया भूमि कानून ला रही है, वह फिर से झारखंडियों को सशंकित कर रहा है.
यही वजह है कि सोमवार के बंद को ठीकठाक जन-समर्थन मिला. प्रस्तावित भूमि कानून को लेकर यह देश में पहला बंद था. इसे दूसरे राज्यों में दोहराया जाये, उससे पहले इसके संदेश को समझ लेना बेहतर होगा. मोदी सरकार को चाहिए कि वह विपक्ष के साथ संवाद के रास्ते खोले और अध्यादेश व संयुक्त सत्र के जोर से इस कानून को थोपने की कोशिश न करे.
विकास के नाम पर भूमि अधिग्रहण कानून से पहले प्रभावित होनेवाले तबकों में विश्वास बहाली की जरूरत है. सरकार को चाहिए कि वह ‘बंद’ और ‘विकास’ के समर्थकों के बीच एक सेतु बनाये.
