किसी बेटी के जन्म के साथ ही नहीं, बल्कि जन्म से पहले गर्भ में उसकी उपस्थिति का एहसास होते ही माता-पिता चिंताओं की गहराई में डूब जाते हैं. सवाल है कि वह कौन सा भय है, जो उन्हें चिंता के सागर में डुबा देता है.
यह दानव हर घर में मौजूद है और वह है दहेज. इस डर से लड़की का पिता उसके जन्म के पहले से ही चिंतित हो जाता है. बड़ी अजीब बात है कि यह दहेज रूपी दानव अब लोगों के लिए समाज में प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया है.
इस तरह की मानसिकता ही दहेज को बढ़ावा दे रही है. इस मानसिकता को न केवल बदलने बल्किदहेज के कारण होनेवाली प्रत्येक हिंसा के खिलाफ जोरदार आवाज उठाने की आवश्यकता है. जरूरत सिर्फ महिला दिवस पर ही महिलाओं के सशक्तीकरण की बात करने की नहीं है, बल्कि उनके सशक्तीकरण के सिद्धांत को जीवन में उतारना होगा.
संजय राय भट्ट, ई-मेल से
