विद्या के मंदिर में अंडे क्यों?

वर्तमान समय में शिक्षा व्यवस्था एक मजाक का विषय बन गयी है. जीविकोपाजर्न के लिए शिक्षा पर अधिक जोर है. इसके आगे जीवन की शिक्षा गौण हो गयी है. नैतिक शिक्षा, कला विषयों, धार्मिक-सामाजिक-पारिवारिक मूल्यों और देशभक्ति की पढ़ाई तो पाठ्यक्रमों से विलुप्त होती जा रही है. परिणाम: समाज अराजकता, अशांति, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन […]

वर्तमान समय में शिक्षा व्यवस्था एक मजाक का विषय बन गयी है. जीविकोपाजर्न के लिए शिक्षा पर अधिक जोर है. इसके आगे जीवन की शिक्षा गौण हो गयी है. नैतिक शिक्षा, कला विषयों, धार्मिक-सामाजिक-पारिवारिक मूल्यों और देशभक्ति की पढ़ाई तो पाठ्यक्रमों से विलुप्त होती जा रही है.
परिणाम: समाज अराजकता, अशांति, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन की ओर से तेजी से अग्रसर है. कहा जाता है कि जैसा अन्न, वैसा मन. फिर प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर रहे कोमल मन के बच्चों को तामसिक भोजन की ओर क्यों धकेला जा रहा है?
विद्या के मंदिर में अंडे क्यों परोसे जा रहे हैं? हम अभी से बच्चों को अतिरिक्त पोषण के नाम पर अंडा क्यों दे रहे हैं? अंडे के स्थान पर एक गिलास दूध या फिर चना और गुड़ का प्रबंध क्यों नहीं किया जा रहा है. पोषाहार के नाम पर मांसाहार क्यों?
जयकिशोर पांडेय, दैहर, हजारीबाग

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