मैं इस समाचार पत्र के माध्यम से देश की नारियों से कुछ कहना चाहती हूं. आज देश की आजादी के बाद भी हम पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं हो पाये हैं. हर स्थान पर नारी सशक्तीकरण की बात की जाती है.
अगर सही मायने में नारी को उसका हक दिलाना है, तो उसे आत्मनिर्भर बनना या बनाना होगा. एक ‘अबला’ नारी को जब उसका पति प्रताड़ित करता है और उसकी ससुराल के लोग उस पर अत्याचार करते हैं, तो वह उसका चुपचाप सहन कर लेती है, क्योंकि वह उसे छोड़ नहीं सकती. यदि छोड़ भी दे, तो वह जाये तो जाये कहां?
माता-पिता उसे बोझ समझते हैं और एक बार बोझ हल्का होने के बाद वे उसे अपने कंधों पर क्यों ढोते फिरेंगे? एक अफसर दंपती में झगड़ा होता है, तो पत्नी तलाक देने में सक्षम होती है, मगर आम नारी नहीं? आखिर कब जागेगी इस देश की नारी?
प्रतिभा तिवारी, मधुपुर
