किसानों की सही चिंता किसी को नहीं

सच्चई यह है कि किसानों की सही चिंता किसी को नहीं है. उसकी चिंता कर हम मनुष्य बने रह सकते हैं. मनुष्यता भी जीवित रहेगी. भारत उद्योगपतियों का देश है या किसानों का? क्या दोनों में कोई सहज रिश्ता संभव है? किसान एक साथ सत्ता-व्यवस्था और प्राकृतिक कहर से जूझ रहा है. उसकी जुझारू शक्ति […]

सच्चई यह है कि किसानों की सही चिंता किसी को नहीं है. उसकी चिंता कर हम मनुष्य बने रह सकते हैं. मनुष्यता भी जीवित रहेगी. भारत उद्योगपतियों का देश है या किसानों का? क्या दोनों में कोई सहज रिश्ता संभव है?
किसान एक साथ सत्ता-व्यवस्था और प्राकृतिक कहर से जूझ रहा है. उसकी जुझारू शक्ति घट रही है और वह बड़ी मात्र में आत्महत्या कर रहा है. नवउदारवादी अर्थव्यवस्था और पूंजीवादी बाजारू अर्थव्यवस्था से किसान सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं. स्वतंत्र भारत के आरंभिक वर्षो में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि क्षेत्र का अच्छा-खासा योगदान था. 1950-51 में यह योगदान जहां 55 प्रतिशत था, वहीं अब यह घट कर 15 प्रतिशत से भी कम रह गया है. दिनकर ने दिल्ली पर लिखी एक कविता में दिल्ली को ‘कृषक-मेघ की रानी’ और ‘वैभव की दीवानी’ कहा था. अब गांव गोद लिये जा रहे हैं और स्मार्ट सिटी बनाने पर अधिक जोर है.

गरीबी और अमीरी की खाई गांव और शहर में बढ़ रहे फैसले सरकारी नीतियों के तहत हैं. किसान खेती छोड़ने, गांव छोड़ने और मजदूर बनने के लिए विवश है. प्रेमचंद ने तीस के दशक के आरंभ में ही पहचान लिया था कि सामान्य किसान मजदूर बनेगा. होरी किसान से मजदूर बना. पिछले एक दशक में किसानों की संख्या करीब एक करोड़ घटी है. उन्होंने खेती छोड़ दी है.

मुख्य प्रश्न राज्य के सरोकार का है. सरोकार बदलने से नीतियां बदलती हैं, व्यवहार-आचरण बदलता है, चरित्र भी. नेहरू से मोदी तक राज्य का चरित्र बदल गया है.

लालबहादुर शास्त्री ने जब ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया था, उनकी चिंता में एक साथ देश की प्रगति और बाह्य सुरक्षा का सवाल बड़ा था. स्वतंत्र भारत में विकास की सभी नीतियां कृषक-विरोधी रही हैं. आजादी के कुछ महीने बाद 12 अप्रैल, 1948 को तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने ओड़िशा में हीराकुंड बांध की नींव रखते समय किसानों को देश के लिए कष्ट उठाने को कहा था. उस समय से आज तक विस्थापितों की संख्या चार-पांच करोड़ है. किसानों के लिए उद्योगपति, प्रभवर्ग, शासक वर्ग के साथ सरकारी अफसरों-कर्मचारियों ने कष्ट नहीं उठाया. अंगरेजों ने 1894 में जो भूमि अधिग्रहण कानून बनाया, वह करीब 120 वर्ष तक क्यों कायम रहा? इस कानून को बदलने में जहां 120 वर्ष लगे, वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2013 में बदले कानून को झटपट एक वर्ष में (2014) बदल दिया. मोदी सरकार को ‘फैसिलेटेटर’ के रूप में देखते हैं. उनका लगातार विदेशी दौरा पूंजी निवेशकों को बुलाने, आकर्षित करने के लिए है. सरकार का काम देशी-विदेशी निवेशकों व निगमों को समस्त सुविधाएं प्रदान करना है. कांग्रेस किसानों को लेकर जो चिंतित दिख रही है, वह चिंता ऊपरी है. मनमोहन सिंह ने करोड़ों टन गेहूं सड़ने दिया, सुप्रीम कोर्ट के कहने पर भी गरीबों में उसका वितरण नहीं किया गया. मुट्ठी भर उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, कॉरपोरेटों के हवाले देश कर दिया गया है. बारिश, आंधी और तूफान से उजड़े गांवों, किसानों को थोड़ी राहत दी जा सकती है, मुआवजा भी दिया जा सकता है (दिया जाता है), पर किसानों की हालत तब तक नहीं सुधर सकती, जब तक ‘विकास’ की शैतानी अवधारणा में सुधार नहीं किया जाता. आज भी देश की अधिक आबादी किसानों की है, पर उनकी चिंता किसी को नहीं है. राजनीतिक दलों का चरित्र बदल चुका है. सारे आयोजन शहरों के पांच सितारा होटलों में होते हैं. रोजगार के किसी वैकल्पिक साधन के अभाव में किसानों का जीना दूभर हो चला है. ‘उत्तम खेती’ वाली बात पुरानी हो चुकी है. अब छोटे किसानों के लिए खेती करना मजबूरी है. खाद्यान्न की कीमत पिछले 40-45 वर्षो में अधिकतम बीस गुना बढ़ी है, जबकि कर्मचारियों के वेतन में सौ गुना का इजाफा हुआ है. शिक्षा और स्वास्थ्य का खर्च दो सौ-तीन सौ गुना बढ़ा है और जमीन की कीमत बेतहाशा बढ़ी है- हजार गुना से अधिक.

विकास की मौजूदा अवधारणा से प्राकृतिक संकट, जलवायु संकट और प्राकृतिक उद्वेलन जुड़ा है. बेमौसम बरसात का भी यह एक प्रमुख कारण है. प्रकृति विरोधी, जीवन विरोधी, मानव विरोधी, मूल्य विरोधी विकास के इस फलसफे ने सर्वत्र एक अस्थिरता, एक खलबली पैदा की है. गहरी हताशा और निराशा में की जानेवाली किसानों की आत्महत्या भारत के राज्य-चरित्र, प्रतिनिधिक-संसदीय लोकतंत्र और राजनीतिक दलों पर प्रश्न-चिह्न् है. मात्र दस वर्ष (2001-2011) में 2,70,940 किसानों ने आत्महत्या की है. किसानों का विश्वास भारतीय राज्य, सत्ताधारी वर्ग और अनेक राजनीतिक दलों से उठ चुका है. किसानों को बदहाल कर एक सीमित तबका खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहा है.
अस्सी के दशक के मध्य से, जब आर्थिक नीति में एक नये मोड़ का आरंभ हुआ, किसानों की स्थिति क्रमश: बदतर होती गयी. राज्य में पहले जो थोड़ी-बहुत शर्म-हया थी, वह समाप्त हो गयी और राज्य का आतंक बढ़ गया. झारखंड, ओड़िशा और छत्तीसगढ़ खनिज संसाधन-संपन्न राज्य हैं और इन तीन राज्यों के डेढ़ सौ जिले निर्धनतम हैं. बिहार कृषि-प्रधान राज्य है और यहां के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी, जो एक नया राजनीतिक दल बनाने की इच्छा रखते हैं, ने भूमि अधिग्रहण विधेयक को जायज ठहराया है, जबकि अनेक राजनीतिक दल इसके खिलाफ हैं. ढांचागत विकास के लिए इस विधेयक (अध्यादेश) को मोदी सरकार उचित ठहरा रही है. आजाद भारत में 66 वर्ष तक कायम रहनेवाले इस कानून में संप्रग-2 में 26 बड़े संशोधन किये थे, जिसका देशी कॉरपोरेट घरानों ने विरोध किया. संसदीय लोकतंत्र, प्रतिनिधिक लोकतंत्र निगमित लोकतंत्र (कॉरपोरेट डेमोक्रेसी) में बदल चुका है. किसानों की हालत खराब होती गयी और अमीर अधिक अमीर होते गये. सत्तर के दशक में ‘भारत: एक बंधक राष्ट्र’ की जो बात कही गयी थी, वह उस समय उतनी सच नहीं थी. आज चार भारतीयों में से तीन कुपोषित हैं.
14वीं लोकसभा में तीस प्रतिशत, 15वीं लोकसभा में 58 प्रतिशत और अबकी 16वीं लोकसभा में 82 प्रतिशत सांसद करोड़पति हैं. किसान मर रहे हैं और भारत में अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है. पिछले दस वर्ष में यह आठ से बढ़ कर 103 हो चुकी है. निर्लज्ज पूंजी ने निर्लज्जता को चरम पर पहुंचा दिया है. सोनिया और राहुल गांधी मंच पर हाथ में हल रखे दिख रहे हैं और केजरीवाल की रैली में एक किसान जान दे देता है. नंदीग्राम, कलिंगनगर, कालाहांडी, यमुना एक्सप्रेस वे में राज्य ने हिंसा का सहारा लिया. भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का राष्ट्रीय स्तर पर विरोध जरूरी है. इससे राजनीति भी जीवित होगी और किसानों में एकजुटता आयेगी. अब लेखकों-पत्रकारों को तय करना होगा कि वह किसके साथ है? हताशा को संघर्ष में बदलने की जरूरत है. सच्चई यह है कि किसानों की सही चिंता किसी को नहीं है. उसकी चिंता कर हम मनुष्य बने रह सकते हैं. मनुष्यता भी जीवित रहेगी. भारत उद्योगपतियों का देश है या किसानों का? क्या दोनों में कोई सहज रिश्ता संभव है?
रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
delhi@prabhatkhabar.in

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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