अब पीने का कोई बहाना नहीं चाहिए

मुङो पीने का शौक नहीं, पीता हूं गम भुलाने को.. जी नहीं. ऊपरवाले की इनायत से न मुङो अभी तक पीने का कोई शौक चढ़ा है और न ही कोई गम है, जिसे भुलाने को पीना शुरू कर दूं. लेकिन ऐसा लग रहा है कि इन दिनों आ रहे बॉलीवुड के गाने मुझ जैसों को […]

मुङो पीने का शौक नहीं, पीता हूं गम भुलाने को.. जी नहीं. ऊपरवाले की इनायत से न मुङो अभी तक पीने का कोई शौक चढ़ा है और न ही कोई गम है, जिसे भुलाने को पीना शुरू कर दूं. लेकिन ऐसा लग रहा है कि इन दिनों आ रहे बॉलीवुड के गाने मुझ जैसों को पीने के लिए प्रेरित करने के वास्ते बन रहे हैं. अब देखिए न, ‘दबंग’ का गाना हमका पीनी है पीनी है हमका पीनी है, ‘कॉकटेल’ का चढ़ी मुङो यारी तेरी ऐसी जैसे दारू देसी, ‘रागिनी एमएमएस 2’ का चार बोतल वोदका काम मेरा रोज का, ‘द शौकीन्स’ का हां मैं एल्कोहॉलिक हूं.. जैसे गाने सुन कर शराब न पीनेवाले में भी शराब पीने की तलब जग जाये. बच्चों के लिए बने गीतों व कविताओं में भी आजकल शराब घुसायी जा रही है.

पिछले साल आयी फिल्म ‘इट्स एंटरटेनमेंट’ का गाना जॉनी-जॉनी, हां जी/ तूने पी है, ना जी.. और हाल ही में चार्टबस्टर्स में शामिल हुआ ‘वेलकम टू कराची’ का गाना लल्ला लल्ला लोरी, दारू की कटोरी.. इसी के उदाहरण है. बच्चे ऐसी चीजें जल्दी सीखते हैं. ऐसे में अगर आप अपने बच्चे को ‘लल्ला लल्ला लोरी’ सुनाने को बोलें और वह उसी लय-ताल में दारू की कटोरी गाने लगे तो हैरान न होइएगा.

पता नहीं, ऐसे गाने लिखनेवालों को शराब बनानेवाली कंपनियां कमीशन देती हैं या कुछ और! यूं तो बॉलीवुड में ‘दारू विच प्यार मिलाने’ का प्रचलन राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन और उनसे भी पहले से चला आ रहा है. बाद में नब्बे के दशक में कभी-कभार ऐसे गाने दिख जाते थे, जिनमें शराब का इस्तेमाल हो रहा हो. आम तौर पर ऐसे गाने स्क्रिप्ट की मांग पर होते थे. लेकिन आज की फिल्मों में स्क्रिप्ट ही ऐसे गानों को ध्यान में रख कर लिखी जा रही है. पुरानी फिल्मों के गानों के बोल में शराब और इससे जुड़े शब्द कलात्मक ढंग से इस्तेमाल होते थे, लेकिन आज के गानों में शराब, दारू, टल्ली, वोदका का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है. ऐसे गानों के मामले में हनी सिंह और मीका सिंह सबसे आगे हैं और ऐसा लगता है जैसे इनका घर मानो ऐसे गानों की बदौलत ही चल रहा हो.

इन गानों को बाजार में सफलता भी मिल रही है और ‘पार्टी एंथम’ के तौर पर ये अपनी पहचान भी तेजी से बना रहे हैं, जिससे धीरे-धीरे दूसरे गायकों को भी प्रेरणा मिल रही है. बात गजल की करें तो शराब का जिक्र होना ही है. पंकज उधास गाते हैं- ‘मयखाने से शराब से साकी के जाम से, अपनी तो जिंदगी शुरू होती है शाम से’, लेकिन गजल का मूड कुछ ऐसा होता है और इसके दर्शक प्राय: बच्चे नहीं होते. लेकिन फिल्मों से तो हर कोई प्रभावित होता है और बच्चे व युवा खास तौर से, जिनका दिमाग नयी चीजें सीखने को लालायित होता है. ऐसे में इन गानों को वे पहले गुनगुनायेंगे और फिर गायेंगे दारू पीता हूं कभी नाप के नहीं, अपनी पीता हूं किसी के बाप की नहीं. हां मैं एल्कोहॉलिक हूं..

राजीव चौबे

प्रभात खबर, रांची

askrajeev123@gmail.com

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