अंकों के बोझ तले दब रहा बचपन

किसी भी मनुष्य के लिए बाल्यकाल उसके जीवन का सबसे स्वर्णिम समय होता है. बचपन की स्मृतियां जीवन भर उसके साथ रहती हैं, लेकिन क्या आज के बच्चे बचपन के सुखद क्षणों को खुल कर जी पाते हैं? जन्म लेने से पहले ही माता-पिता बच्चे के भविष्य की कल्पना करने लगते हैं और रेस के […]

किसी भी मनुष्य के लिए बाल्यकाल उसके जीवन का सबसे स्वर्णिम समय होता है. बचपन की स्मृतियां जीवन भर उसके साथ रहती हैं, लेकिन क्या आज के बच्चे बचपन के सुखद क्षणों को खुल कर जी पाते हैं?
जन्म लेने से पहले ही माता-पिता बच्चे के भविष्य की कल्पना करने लगते हैं और रेस के घोड़े की तरह अच्छे अंक पाने के लिए बच्चे को दौड़ में सबसे आगे लगा देते हैं. अंतत: अपने माता-पिता की अपेक्षाओं पर खरा न उतर पाने के गम में बालमन हताश हो जाता है और गलत कदम उठाने पर मजबूर हो जाता है. अंकों के बोझ तले आज कोमल बचपन दब गया है, आसमान में सितारों की तरह कहीं खो गया है.
आज यह बहुत ही जरूरी है कि माता-पिता अपने बच्चे पर अंकों का दबाव न डालें और इसे हौवा न बनायें. हर बच्चे के अंदर प्रतिभा छिपी होती है, उसी को निखारने का प्रयास करें.
आस्था मुकुल, रांची

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