शीतला सिंह
संपादक, जनमोर्चा
पुत्र-मोह का सिद्धांत यही बताता है कि सोनिया गांधी उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बना कर संतुष्ट होना चाहेंगी कि चलो हमारी ओर से कोई कमी नहीं रह गयी और यही राहुल गांधी का मलाल और नयी स्थितियों में उनके संतोष का कारण हो सकता है.
विदेश से दो महीने बाद लौटे राहुल गांधी अब संसद में तर्क, आंकड़े और वाचालता के बल पर अपनी नयी पहचान बनाना चाहते हैं, जिससे वे अभीप्क्षित कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर आसीन हो सकें. सोनिया गांधी से जब यह पूछा गया कि राहुल पार्टी अध्यक्ष कब बनेंगे, तो उन्होंने कहा कि राहुल से पूछ लीजिए, यानी सब कुछ राहुल की इच्छा पर है. कांग्रेस का एक वर्ग 2009 में ही उन्हें प्रधानमंत्री बनाना चाहता था, लेकिन वे हिम्मत नहीं जुटा पाये.
तर्क दिया गया कि अभी वे संसदीय परंपराओं का अध्ययन और सरकार चलाने के लिए अपेक्षित योग्यता अजिर्त कर रहे हैं. कुछ लोगों की राय थी कि सरकार चलाने का अनुभव बिना पद के नहीं हो पाता. अपनी प्रयोग भूमि बनाने के लिए राहुल के लिए सरकार के सभी विभाग खुले हुए थे.
कांग्रेस के एक वर्ग का यह भी कहना था कि अगर राहुल गांधी प्रधानमंत्री नहीं बनते, तो एक ऐसा अवसर खो रहे हैं, जो भविष्य में नहीं मिलनेवाला है, इसलिए 2014 के पहले उन्हें यह पद स्वीकार कर लेना चाहिए. जो अनुमान था वह असलियत में परिवर्तित हो गया. इस बार के चुनाव में कांग्रेस को इतनी सीटें भी नहीं मिल पायीं, जिससे वह विपक्ष में बैठ सके. इसलिए वर्तमान स्थिति में कांग्रेस पार्टी की हैसियत विपक्ष के सबसे बड़े दल तक ही सीमित होकर रह गयी है. उसी के आसपास तमिलनाडु की अन्नाद्रमुक और पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस भी हैं.
इसलिए यह मानना पड़ेगा कि इस चुनाव में भाजपा को चुनौती अपने प्रदेशों में, जहां वे सत्तारूढ़ हैं, इन क्षेत्रीय पार्टियों ने ही दी. नये तथ्य यही बताते हैं कि अधिकतर सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी थी. इसलिए भविष्य के लिए यह सवाल पैदा हो गया है कि कांग्रेस की वापसी के लिए वे कौन से राज्य होंगे, जहां से उम्मीद की जाये.
कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका 1977 में लगा था, लेकिन उस समय भी कांग्रेस की यह दुर्गति नहीं थी. उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान में कांग्रेस का इस प्रकार सफाया नहीं हुआ था. आंध्र और कर्नाटक दो ऐसे राज्य थे, जहां उस चुनाव में भी प्रदेश की कुल लोकसभा सीटों में से अधिकांश कांग्रेस को ही प्राप्त हुई थीं. 2004 में गंठबंधन के बल पर कांग्रेस पुन: सत्तारूढ़ हुई थी.
लेकिन, राजनीतिक पंडितों का अनुमान यही है कि यह नतीजा भाजपा की गंठबंधन सरकार, जिसे राजग कहा जाता है, की असफलता का द्योतक था. कांग्रेस को मजबूत विकल्प न होने का लाभ मिला था. 2009 में उसकी हैसियत में थोड़ा इजाफा भी हुआ था, लेकिन पिछले चुनाव में वह सबसे बुड़ी स्थिति में पहुंच गयी.
अब जहां तक राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष बनने का प्रश्न है, जब चयन का मुख्य आधार नेहरू परिवार के बीच में ही सीमित रहेगा, तो राहुल के अलावा उसके पास विकल्प ही क्या बचता है?
सोनिया गांधी विदेश से गंभीर मर्ज का इलाज करा कर लौटी हैं. उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे वर्तमान राजनीतिक संदर्भो में सत्ता संभालने लायक हैं, इसलिए सारी उम्मीदें राहुल गांधी तक ही सीमित हैं. पार्टी में वैकल्पिक नेता की खोज में नेहरू परिवार से अलग कहीं दृष्टि ही नहीं जाती.
कांग्रेस विरोध के नाम पर जो दल उभरे, उन्हें सबसे अधिक समर्थन दलित और पिछड़े समुदाय का ही मिला था. वे अस्मिता की राजनीति के प्रतीक बने, लेकिन जब सत्ता में पहुंचे, तो स्वार्थो का संघर्ष इन्हें भी विभाजित होने से नहीं रोक सका. जैसे तमिलनाडु में अब वे द्रमुक और अन्नाद्रमुक के रूप में पहचाने जाते हैं.
द्रमुक को पिछली बार, उत्तर प्रदेश में मायावती की बसपा की भांति, लोकसभा की कोई सीट नहीं मिल पायी. तर्क यह दिया जाता है कि उन्हें कांग्रेस के भ्रष्टाचार का भरपूर लाभ उठानेवाला माना गया. जनता ने जयललिता की गलतियों को माफ कर उन्हें बहुमत सौंपा. लोकसभा में भी उन्हें इतनी सीटें मिलीं, जितनी पहले नहीं मिली थीं. इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि राजनीतिक दलों में भ्रष्टाचार और वैयक्तिक लाभ उठाने की प्रवृत्तियां कम हुई हैं.
कांग्रेस और भाजपा सहित कई दलों के बड़े नेताओं को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल की हवा खानी पड़ी है. जैसे भ्रष्टाचार और सत्ता एक-दूसरे के पूरक हैं. लोकतंत्र में जनता इन आरोपों को किस रूप में देखती है और किस प्रकार का रुख अपनाती है, वही चुनाव परिणामों में निर्णायक बन जाता है. ऐसे समय में राहुल गांधी कांग्रेस की नयी आशाओं के केंद्र सिर्फ इसलिए हैं, क्योंकि जब वैकल्पिक नेतृत्व का सवाल उठता है, तो पार्टी में कोई है ही नहीं.
इस प्रकार पुत्र-मोह का सिद्धांत यही बताता है कि सोनिया गांधी उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बना कर संतुष्ट होना चाहेंगी कि चलो हमारी ओर से कोई कमी नहीं रह गयी और यही राहुल गांधी का मलाल या नयी स्थितियों में उनके संतोष का कारण हो सकता है.
