अभिभावक नोट नहीं छापते!

आज शिक्षा के नाम पर देश में व्यापार हो रहा है. अभिभावकों से वसूली की जा रही है. निजी स्कूलों में मनमाने तरीके से फीसों की वसूली की जा रही है. पूर्व निर्धारित फीस में वृद्धि करके री-एडमिशन कराया जा रहा है. सरकारी स्कूल हो या निजी, कहीं भी बच्चों को पढ़ाना आसान नहीं है. […]

आज शिक्षा के नाम पर देश में व्यापार हो रहा है. अभिभावकों से वसूली की जा रही है. निजी स्कूलों में मनमाने तरीके से फीसों की वसूली की जा रही है. पूर्व निर्धारित फीस में वृद्धि करके री-एडमिशन कराया जा रहा है.
सरकारी स्कूल हो या निजी, कहीं भी बच्चों को पढ़ाना आसान नहीं है. निजी स्कूलों के प्रबंधक अभिभावकों को नोट छापने की मशीन समझ कर लूट रहे हैं, तो सरकारी स्कूलों में पढ़ाई ही नहीं होती. कहीं शिक्षकों का अभाव है, तो कहीं शिक्षा का. आज की तारीख में अभिभावकों को बच्चों को पढ़ाना आसान नहीं है.
लगता है कि निजी स्कूल के मालिक/प्रबंधक स्कूल का सारा खर्च अभिभावकों से ही वसूल लेना चाहते हैं. शिक्षा आम आदमी और मध्यमवर्गीय परिवार की जेब पर भारी पड़ रही है. सरकार को चाहिए कि वह इसे कारोबार बनाने देने के बजाय इसमें सुधार करे.
मंजरी मिश्र, जमशेदपुर

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