ताकि गायें बथानों में आबाद रहें

महेंद्र सुमन सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक गायों के जिंदा रहने की शर्त है कि वे किसानों के खेत-खलिहानों और सबसे बढ़ कर उनके बथानों में आबाद रहें, न कि गौरक्षणी संघों या सरकार के गौशाला सह पुनर्वास केंद्रों की शोभा बन कर रह जायें. दुनिया के विख्यात फूड चेन मैकडोनॉल्ड के भारतीय आउटलेट्स ने अपने को बीफ […]

महेंद्र सुमन

सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक

गायों के जिंदा रहने की शर्त है कि वे किसानों के खेत-खलिहानों और सबसे बढ़ कर उनके बथानों में आबाद रहें, न कि गौरक्षणी संघों या सरकार के गौशाला सह पुनर्वास केंद्रों की शोभा बन कर रह जायें.

दुनिया के विख्यात फूड चेन मैकडोनॉल्ड के भारतीय आउटलेट्स ने अपने को बीफ व पोर्क मुक्त घोषित कर रखा है. वहां मार्केटिंग में काम करनेवाला दिमाग यह जानता है कि भारत में इन खाद्य पदार्थो को लेकर वजर्नाएं हैं, अत: अपने उत्पादों की पहुंच बढ़ाने के लिए उन्होंने यह रणनीति बनायी है.

दूसरी ओर कोलकता का मशहूर बीफ किंग रेस्तरां है, जिसके ग्राहकों की एक अच्छी तादाद हिंदुओं की है. वहीं महाराष्ट्र के कुछ हिंदू समूहों, उत्तरपूर्व राज्यों के हिंदू खासी समुदाय, केरल, गोवा आदि में ऐसी कोई कठोर वजर्ना नहीं है. हर समाज में खानपान को लेकर अपनी वजर्नाएं और साथ ही अपने स्वाद होते हैं.

यहां हम इस स्थापित तथ्य कि प्राचीन काल में हिंदुओं में गोमांस का चलन था, की बहस में नहीं जा रहे हैं.

बहस के और भी कई कोण हैं- बहुसंख्यकों की धार्मिक आस्था, ‘बीफ’ की खरीद-फरोख्त का अर्थव्यवस्था पर असर, उसके स्वास्थ्य से जुड़े फायदे, बीफ बैन की राजनीति आदि. यहां हमारा फोकस किसी प्रजाति की संरक्षा पर जैव विविधता एवं प्राकृतिक सिद्धांतों के नजरिये से विचार करना है. क्या किसी प्रजाति का अत्यधिक शिकार और अत्यधिक बचाव के रूप में मनुष्य के हस्तक्षेप का कभी कोई सार्थक नतीजा निकला है? यह विचार करना जरूरी है कि बतौर प्रजाति गो-वंश आज जिस परिवेश और स्थिति में है, उसमें इस बैन (अत्यधिक बचाव) का क्या असर पड़ेगा?

आज बतौर प्रजाति गो-वंश को बचाने के लिए इनकी सेलेक्टिव क्यूलिंग (मांस आदि के लिए चुनिंदा पशुओं को मारना) जरूरी है. चूंकि गायों का कोई प्राकृतिक शिकारी नहीं है, ऐसे में एक समय के बाद अनुत्पादक हो चुके गो-वंशजों (गाय, बछड़े, बैल) की सेलेक्टिव क्यूलिंग जरूरी है. वन्यजीव अभ्यारण्यों की पूरी कवायद यही होती है कि शिकार और शिकारी के बीच एक संतुलन बनाये रखा जाये.

ऐसा एक प्रजाति के रूप में इनको बचाये रखने के लिए भी जरूरी है, नहीं तो अनुत्पादक हो चुकी गायों को पालना और फिर इनकी प्राकृतिक मौत के दौरान होनेवाले संक्रामक रोगों से इस प्रजाति और मानव प्रजाति को सुरक्षित करना मुश्किल होगा. गो-रक्षक तर्क दे सकते हैं कि अनुत्पादक जानवरों की जिम्मेवारी सरकार को लेनी चाहिए़, लेकिन न तो यह व्यावहारिक होगा और न ही सरकार पर भरोसा किया जा सकता है.

अगर गो-वंश की सेलेक्टिव क्यूलिंग नहीं हुई, तो बूढ़े गाय-बैलों की देखभाल करना आर्थिक कारणों से पशुपालक समाज के लिए संभव नहीं रह जायेगा, और तब ये कुत्ताें-सुअरों जैसी हालत में पहुंच जायेंगी. एक गाय पांच से आठ बच्चे जनने के बाद बूढ़ी (अनुत्पादक) हो जाती है. साथ ही बैल, बछड़ों का उपयोग अब खेती में बहुत कम रह गया है. गर्भाधान के भी ज्यादातर मामलों में अब यह कृत्रिम तरीके से ही होता है. इस कारण भी अब सांड़ों की पहले जैसी उपयोगिता नहीं रह गयी है.

पशुपालक समुदाय सब कुछ जानते हुए गो-मांस का व्यापार करनेवालों के हाथों गाय-बैलों को बेचता रहा है. यह उनकी आर्थिक गतिविधि का अपरिहार्य हिस्सा है और समाज में सहज रूप से स्वीकार्य भी. कोई भी पशुपालक समाज सिर्फ दुग्ध उत्पादों के भरोसे नहीं रह सकता. लोकसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी के ‘पिंक रिवॉल्यूशन’ वाले भड़काउ भाषण से यह उजागर हुआ था कि डेयरी के मामले में समृद्ध गुजरात बीफ का भी बड़ा निर्यातक राज्य है.

आज ‘बीफ’ के बड़े निर्यातक देशों में से एक भारत भी है. ऐसे में बीफ बैन कहीं भाजपा के चर्चित जीडीपी के दावे पर भारी न पड़ जाये. भारत में दुग्ध और बीफ उत्पादन में गायों के मुकाबले भैंसों की ज्यादा हिस्सेदारी है. फ्रीजियन, जर्सी, स्विस ब्राउन आदि विदेशी नस्लों के आने से देशी गाय की नस्लें संकट से गुजर रही हैं. भैंस बीफ की बजाय सिर्फ गाय बीफ पर बैन निश्चय ही गाय पालन की पूरी अर्थव्यवस्था को चौपट कर देगा.

भाजपा शासित राज्य सरकारों और संघ परिवार की मंशा है कि गाय बीफ पर बैन लगाने की सांप्रदायिक राजनीति कर फायदा उठाया जाये. एक समुदाय विशेष को निशाने पर लेते हुए पशुपालक और कृषक समाज में सांप्रदायिक उन्माद भड़काया जाये. एक राम, एक अयोध्या, एक गीता के तर्ज पर एक टोटम- ‘गाय’ के जरिये वह हिंदू समाज का रेजिमेंटेशन चाह रहे हैं.

कट्टर हिंदूवादी तथाकथित गौ-रक्षकों के आंदोलनों को हिंदू समाज ने कभी गंभीरता से नहीं लिया है, तथापि कई मौकों पर इन आंदोलनों की परिणति इतिहास के सबसे भयानक दंगों में हुई है. गायों के जिंदा रहने की शर्त है कि वे किसानों के खेत-खलिहानों और सबसे बढ़ कर उनके बथानों में आबाद रहें न कि गौरक्षणी संघों या सरकार के गौशाला सह पुनर्वास केंद्रों की शोभा बन कर रह जायें.

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