बीते कुछ महीनों से आंकड़ों में नीचे रह रही महंगाई अगर आम आदमी की जेब को राहत नहीं दे रही, तो इसकी तह तक पहुंचना जरूरी हो जाता है. आंकड़ों के अनुसार यह लगातार पांचवां महीना है, जब थोक महंगाई दर शून्य से नीचे रही है. यह कमी मुख्यत: कच्चे तेल के दाम गिरने से आयी है.
खुदरा महंगाई दर भी मार्च में 5.37 फीसदी से गिर कर 5.17 फीसदी हो गयी है. हालांकि खाद्य पदार्थो में दालों, फलों, सब्जियों, प्याज और दूध के दाम बढ़े हैं. उधर, जानकार बता रहे हैं कि यह समय महंगाई के आंकड़ों पर खुश होने का नहीं है, क्योंकि बेमौसम बारिश से रबी फसलों को बड़े पैमाने पर हुए नुकसान के चलते आनेवाले महीनों में महंगाई पर दबाव बना रहेगा.
कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने पिछले दिनों अनुमानों के आधार पर बताया था कि बेमौसम बारिश से 114 लाख हेक्टेयर में खड़ी फसलों को क्षति पहुंची है, जिसमें सर्वाधिक नुकसान गेहूं की फसल को हुआ है. खबरों के मुताबिक इस सीजन में गेहूं उत्पादन अपने लक्ष्य 2 करोड़ 80 लाख टन से करीब 40 लाख टन कम रह सकता है, जबकि रबी फसलों के कुल उत्पादन में 15 से 20 फीसदी की कमी हो सकती है.
हालांकि कृषि मंत्री ने दावा किया है कि देश में खाद्यान्न का पर्याप्त भंडार मौजूद है और सरकार महंगाई बढ़ने नहीं देगी. यहां उल्लेखनीय है कि पिछले आम चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने महंगाई को बड़ा मुद्दा बनाया था, लेकिन हैरानी की बात है कि आंकड़ों में महंगाई के लगातार घटने के बावजूद आम लोगों को रोजमर्रा की चीजें महंगी खरीदनी पड़ रही है.
दामों पर नियंत्रण के लिए सरकार जमाखोरों या कालाबाजारियों के खिलाफ कार्रवाई करती नहीं दिखती. केंद्र और राज्य सरकारें जमाखोरी रोकने का जिम्मा एक-दूसरे पर थोप कर अपने कर्तव्यों से पीछा छुड़ा रही हैं, जबकि कई राज्यों में भाजपा की ही सरकार है. बाजार, आपूर्ति व भंडारण संबंधी दिक्कतों को दूर करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाये जा सके हैं. ऐसे में यह समय सरकारों के लिए कमर कसने का है.
फसल उत्पादन में संभावित कमी का फायदा जमाखोर न उठा पाएं, इसके लिए केंद्र व राज्यों को तालमेल के साथ जरूरी तैयारी करनी चाहिए. उम्मीद करें कि सरकारें अपने दावों पर खरी उतरेंगी और महंगाई पूरे साल नियंत्रण में रहेगी!
