थोड़े में कहें, तो जनता परिवार का विलय राजनीतिक सत्ता के विकेंद्रीकरण और लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन नये अवतार में इसके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पुरानेपन से पीछा छुड़ाने की होगी.
‘जनता परिवार’ यानी 1988 में कांग्रेसी शासन के विरोध में अस्तित्व में आये छह क्षेत्रीय दलों के विलय की घोषणा के महत्व को समझने के लिए इसकी पृष्ठभूमि पर गौर करना होगा. बीते दो दशकों में भारत के राजनीतिक इतिहास की सबसे पुरानी व बड़ी पार्टी कांग्रेस आकार व विचार में सिकुड़ी जरूर थी, पर एक प्रभावशाली दल के रूप में उसका दबदबा कायम था. लेकिन, बीते साल के आम चुनाव ने बुनियादी अर्थो में कांग्रेस के राजनीतिक पराभव की घोषणा कर दी.
दूसरी बात यह कि बीते दो दशकों में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में इस देश ने कांग्रेसी वर्चस्व के बरक्स पहली बार क्षेत्रीय पार्टियों का उभार देखा और गंठबंधन की एक ऐसी राजनीति अस्तित्व में आयी, जिसमें फैसले ‘न्यूनतम साझा कार्यक्रम’ के तहत होते थे, न कि सबसे बड़े दल या नेता की मनमर्जी से.
यह भारतीय राजनीति के शीर्ष स्तर पर सत्ता के विकेंद्रीकरण की दिशा में कदम था, भारतीय संविधान के संघवादी ढांचे और भावना के अनुरूप. गंठबंधन की राजनीति ने शीर्षस्थ सत्ता को विनम्र होना सिखाया. यह भारतीय संघ के भीतर विविध राष्ट्रीयताओं के मुखर होने और राजनीतिक फैसलों में संख्या-बल के अनुकूल भागीदारी की राजनीति थी. इसने सामाजिक न्याय की राजनीति को एक राजनीतिक कार्यक्रम प्रदान किया और सत्ता के तमाम रूपों में समाज के वंचित तबके की भागीदारी को संभव बनाने की पहलकदमी की.
इसने देश में पनपनेवाले पृथकतावादी राजनीतिक रुझानों को संदेश दिया कि सीधे राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदार होकर अपना हक हासिल करना संभव है. लेकिन, बीते साल के चुनावी नतीजों ने गंठबंधन की राजनीति की इस लोकतांत्रिक ऊर्जा को मंद कर किया. देश फिर से एकदलीय वर्चस्व और बहुमत के जोर वाले उस शासन की तरफ बढ़ चला, जिसे लोकतंत्र के लिए घातक मान कर राजनीति की वैकल्पिक धारा के रूप में क्षेत्रीय दलों के रूप में एक तीसरी ताकत का उत्थान हुआ था.
इस नतीजे ने गठबंधन की राजनीति में निहित वंचित तबकों के प्रति हुए ऐतिहासिक अन्याय के प्रतिकार की ताकत का भी क्षरण किया. आम चुनाव के बाद केंद्रीय शासन में जोर ‘विकास’ और ‘सुशासन’ पर है, लेकिन त्वरित विकास के घटाटोप में भारतीय राजनीति का यह बुनियादी सवाल छुप गया है कि विकास में देश के सर्वाधिक गरीब तीस करोड़ लोगों की भागीदारी कितनी और कैसी है. अचरज नहीं कि बीते एक दशक से चला आ रहा ‘समावेशी विकास’ का जुमला भी अब सत्ता के शिखर से कम ही सुनाई पड़ता है.
इस पृष्ठभूमि को सामने रख कर देखें तो ‘जनता परिवार’ के विलय की घटना फौरी चुनावी रणनीतिक कार्रवाई कम और दूरगामी वैकल्पिक राजनीतिक पहल ज्यादा नजर आयेगी. चूंकि ‘जनता परिवार’ की ऐतिहासिक विरासत उसे राजनीति की तीसरी धारा के रूप प्रस्तुत करती है, इसलिए उसके सामने चुनौतियां भी बहुत बड़ी है. नयी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी वैकल्पिक विकास का राजनीतिक एजेंडा पेश करने की, एक ऐसा एजेंडा जिसमें 40 करोड़ मध्यवर्गीय भारतीयों की इच्छाएं ही न झलकती हों, 60 करोड़ से ज्यादा की तादाद में मौजूद ग्रामीण व खेतिहर भारत की प्राथमिकताओं का भी जोर हो. जनता परिवार ने अपने पुराने अवतार में नेतृत्व के शीर्षस्थ स्तर पर महत्वाकांक्षाओं की रस्साकशी देखी है. बहुधा पार्टियों ने पुराने अवतार में नेता के व्यक्तित्व को ऊंचा मान कर राजनीतिक एजेंडे का बलिदान किया है. ऐसे में नयी पार्टी की पायदारी इस बात पर निर्भर होगी कि वह ऐसे अंतर्विरोधों से कितना उबर पाती है.
पार्टी को यह भी ध्यान रखना होगा कि यह 21वीं सदी के दूसरे दशक का भारत है, बीसवीं सदी के सातवें या आठवें दशक का नहीं, जब राजसत्ता लोगों को प्रजा मान कर चलती थी और जनता भी अपने नेताओं को जाति, धर्म, क्षेत्र के हिसाब से ‘माई-बाप’ के रूप में स्वीकारती थी. बीते दो दशकों में भारत में पनपी अधिकारिता आधारित राजनीति लोगों को गरिमापूर्वक जीवन जीने के अवसर देने से जुड़ी रही है.
ऐसे में नयी पार्टी को अधिकारिता आधारित राजनीतिक संस्कृति के अनुरूप नारे-मुहावरे गढ़ने होंगे, न कि जाति या धर्मगत पहचान को तूल देनेवाले नारे-मुहावरे. थोड़े में कहें, तो जनता परिवार का विलय राजनीतिक सत्ता के विकेंद्रीकरण व लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन नये अवतार में इसके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पुरानेपन से पीछा छुड़ाने की होगी.
