जल, जंगल और जमीन झारखंड की पहचान है. नदियों में बहता कल-कल पानी, जंगल में चहचहाते पक्षी और धरती की कोख में भरी अपार खनिज संपदा इसकी संपत्ति है. बदलते समय के साथ झारखंड की संपदा पर बाहरी लोगों की नजर पड़ने लगी.
अंगरेजी शासन का प्रभाव यहां की धरती पर भी पड़ने लगा. वक्त के साथ यहां औद्योगीकरण ने भी पैर पसारा. पूंजीपतियों ने अपना अधिकार जमाना शुरू कर दिया. नतीजतन, बदलते परिवेश में यहां की संस्कृति पिछड़ गयी. हालांकि, विकास के कई दावे किये जाते हैं, पर यहां के वाशिंदे इससे कोसों दूर हैं.
आवास के अभाव में पेड़ों पर मचान बना कर रहने को विवश हैं. स्थानीय नीति के अभाव में तो स्थिति और भी डावांडोल हो गयी है. यहां के लोग सरकारी सुविधाओं से वंचित हैं. सरकार यहां के विकास पर ध्यान दे.
सिदाम महतो, बुंडू, रांची
