आखिर कब घटेगी आपकी इएमआइ!

राजीव रंजन झा संपादक, शेयर मंथन अभी सबको अर्थव्यवस्था में तेजी का बेसब्री से इंतजार है और आरबीआइ की दरों में कटौती उसके लिए एक मुख्य उत्प्रेरक है. इसलिए उद्योग जगत और बैंकिंग क्षेत्र के साथ-साथ केंद्र सरकार की ओर से भी इसके लिए दबाव जारी रहेगा. इन पंक्तियों को लिखते समय समाचार चैनलों की […]

राजीव रंजन झा
संपादक, शेयर मंथन
अभी सबको अर्थव्यवस्था में तेजी का बेसब्री से इंतजार है और आरबीआइ की दरों में कटौती उसके लिए एक मुख्य उत्प्रेरक है. इसलिए उद्योग जगत और बैंकिंग क्षेत्र के साथ-साथ केंद्र सरकार की ओर से भी इसके लिए दबाव जारी रहेगा.
इन पंक्तियों को लिखते समय समाचार चैनलों की सुर्खियां बता रही थीं कि नहीं बदलेगी आपकी इएमआइ. आखिर ऐसा क्या हुआ? क्या मंगलवार को बैंकों को अपनी इएमआइ घटानी थी और उन्होंने वह फैसला टाल दिया? नहीं, आज भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) की नयी मौद्रिक नीति पेश हुई है.
नयी मौद्रिक नीति में आरबीआइ बाकी तमाम बातों के अलावा अपनी ब्याज दरों की समीक्षा भी किया करता है. लेकिन, इस मौद्रिक नीति में आरबीआइ हमारी-आपकी इएमआइ तय नहीं करता. यह काम तो उसी बैंक का है, जिससे हम लोग कोई कर्ज लेते हैं. आरबीआइ उन दरों को तय करता है, जिन पर वह बैंकों को उधार देता है और उनका अतिरिक्त पैसा अपने पास जमा करता है. इसके अलावा वह देश की बैंकिंग व्यवस्था में जरूरत के मुताबिक नकदी की मात्र घटाने-बढ़ाने के उपाय करता रहता है.
बेशक, इस मौद्रिक नीति से देश में ब्याज दरों की दिशा तय होती है. दरअसल, आरबीआइ की ब्याज दरों का असर उन व्यावसायिक बैंकों की लागत पर होता है, जिनसे हम कर्ज लेते हैं.
जब उनके लिए पैसे की लागत कम होती है, तो वे अपने ग्राहकों को कम दर पर कर्ज दे पाते हैं और जब उनकी लागत बढ़ती है, तो वे हमारी इएमआइ बढ़ा देते हैं. मगर यह किसी स्विच की तरह काम नहीं करता कि इधर आरबीआइ ने अपनी दरों को बदला और उधर लोगों की इएमआइ बदल गयी. ऐसा होता तो इस साल जनवरी से अब तक लोगों की इएमआइ दो बार घट चुकी होती, क्योंकि इस दौरान आरबीआइ दो बार अपनी दरों को घटा चुका है.
इस बात को लेकर आरबीआइ गाहे-बगाहे अपनी चिंता जताता रहता है कि उसकी ओर से दी जानेवाली राहत को बैंक अपने ग्राहकों तक पहुंचाने में देरी करते हैं. हालांकि, बैंकों का तर्क है कि आरबीआइ की नीतियों और दरों में बदलाव का उनकी लागत पर असर होने में थोड़ा समय लगता है और जब तक उनकी लागत पर असर नजर न आने लगे, तब तक वे ग्राहकों को उसका फायदा नहीं दे सकते.
उद्योग संगठन फिक्की ने भी चिंता जतायी है कि आरबीआइ ने इससे पहले दो बार दरों में जो कटौती की है, उसका असर बैंकों के स्तर पर नहीं दिख रहा है. बहरहाल, आरबीआइ गवर्नर रघुराम राजन ने उम्मीद जतायी है कि आगे चल कर बैंक कर्जो पर अपनी ब्याज दरों में कटौती करेंगे. दरअसल, इस बार दरों में कोई बदलाव नहीं करने का एक मुख्य कारण ही उन्होंने यह बताया कि नीतिगत दरों (यानी आरबीआइ की दरों) में आयी कमी का असर बैंकों की ब्याज दरों पर अभी तक नहीं हुआ है, वह भी ऐसी स्थिति में जब कर्ज की मांग कमजोर चल रही है और आरबीआइ दो बार अपनी दरें घटा चुका है.
आगे चल कर बैंकों की ब्याज दरों में कमी आने की उम्मीद के पीछे आरबीआइ की सोच यह है कि देश में विकास दर सुधरने की उम्मीदें हैं. साथ ही बैंकिंग व्यवस्था में नकदी पर्याप्त है. ऐसे में बैंक अपनी नकदी को थोड़े कम ब्याज पर ही कर्ज पर चढ़ाना बेहतर समङोंगे. आरबीआइ को उम्मीद है कि इससे अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों को बेहतर दरों पर ऋण मिल सकेगा.
आरबीआइ ने पहले तो जनवरी के मध्य में अपनी रेपो दर को घटाया था. बीते 4 मार्च को फिर से इसमें कमी की गयी थी. कम ही विश्लेषक ऐसे थे, जिन्हें इस समय आरबीआइ की ओर से ब्याज दरों में एक और कटौती की उम्मीद थी, शेयर बाजार की बात अलग है. वह तो ऐसे हर मौके पर कुछ अप्रत्याशित होने की आशा लगा बैठता है. लेकिन उद्योग संगठन कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआइआइ) ने भी आरबीआइ की मौद्रिक नीति आने के बाद अपने बयान में कहा है कि आरबीआइ ने नीतिगत दरों को स्थिर रख कर मौद्रिक ढील देने के बारे में बहुत सतर्क रवैया अपनाया है, ताकि महंगाई दर फिर से न बढ़ने लगे. हालांकि, सीआइआइ का कहना है कि इस समय आरबीआइ की दर में 0.25 फीसदी की हल्की कटौती से उद्योग जगत और उपभोक्ताओं, दोनों का उत्साह बढ़ता और उनकी ओर से मांग बढ़ती.
सीआइआइ का तर्क है कि ऐसे समय में, जब कच्चे तेल और जिंसों (कमोडिटी) के भावों में काफी कमी आयी हुई है और उसके चलते अर्थव्यवस्था महंगाई के दबाव से काफी हद तक मुक्त हुई है, आरबीआइ के पास अभी पर्याप्त गुंजाइश है कि वह महंगाई को नियंत्रण में रखने का लक्ष्य साधते हुए भी ब्याज दरों में कमी कर सके.
सीआइआइ की राय है कि जनवरी और मार्च में हुई कटौती के बाद अभी ब्याज दर में एक और कमी से विकास दर को तेज करने में मदद मिलती. उद्योग संगठन ने उम्मीद जतायी है कि इस साल के दौरान आरबीआइ ब्याज दरों को और 1 प्रतिशत तक घटायेगा. यानी अभी जनवरी और मार्च की दो बार की कटौती से जो रेपो दर 8 प्रतिशत से घट कर 7.5 प्रतिशत पर आयी है, उसे सीआइआइ साल के अंत तक 6.5 प्रतिशत पर देखना चाहता है. अगर आरबीआइ ने इन उम्मीदों को पूरा कर दिया, तो निश्चित रूप से औद्योगिक क्षेत्र और आम उपभोक्ता दोनों को राहत मिलेगी.
भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) की प्रमुख अरुंधती भट्टाचार्य ने भी इस तर्क को आगे बढ़ाया है कि खुद आरबीआइ के अनुमानों के मुताबिक, अब से लेकर अगस्त तक महंगाई दर नरम ही रहने के आसार हैं, लिहाजा रेपो दर में कटौती एक विकल्प हो सकता है. हालांकि, अगर वे आरबीआइ की इस उम्मीद पर भी कुछ साफ ढंग से कहतीं कि दो बार रेपो दर में हुई कटौती का फायदा बैंक जल्दी से अपने ग्राहकों को दें, तो शायद आरबीआइ को भी अगली कटौती में कुछ मदद मिल जाती!
विश्लेषकों का एक तबका मानता है कि बैंक इतनी जल्दी अपनी दरों में कटौती करके अपने मार्जिन को खतरे में नहीं डालेंगे, खास कर सरकारी बैंक जो निजी बैंकों की तुलना में ब्याज से आमदनी पर ज्यादा निर्भर रहते हैं. आरबीआइ इंतजार कर सकता है कि पहले बैंक वास्तव में पिछली कटौतियों को अपने ग्राहकों तक पहुंचाएं, और बैंक इंतजार कर सकते हैं कि आरबीआइ कुछ और कटौती कर दे! इस तरह जुलाई-अगस्त तक का समय निकल सकता है. उसके बाद आरबीआइ के सामने मॉनसून की स्थिति स्पष्ट हो जायेगी और वह अगस्त के आगे की महंगाई दर के बारे में बेहतर अनुमान लगाने की स्थिति में होगा.
आरबीआइ और बैंकों की पहले आप-पहले आप के बीच इतना तो स्पष्ट है कि आरबीआइ को अपनी हर नीतिगत समीक्षा के समय दरों में कटौती के लिए चौतरफा दबाव ङोलना होगा. अभी सबको अर्थव्यवस्था में तेजी का बेसब्री से इंतजार है और आरबीआइ की दरों में कटौती उसके लिए एक मुख्य उत्प्रेरक है. इसलिए उद्योग जगत और बैंकिंग क्षेत्र के साथ-साथ केंद्र सरकार की ओर से भी इसके लिए दबाव जारी रहेगा.

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