झारखंड में आज तक जितनी भी सरकारें बनीं, उसने घोषणाओं और शिलान्यासों का अंबार लगा दिया. बीते साल हुए विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में न जाने कितनी घोषणाएं की गयीं, मगर अब तक एक भी घोषणा को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है. पिछली सरकार की घोषणाओं को नयी सरकार पूरा करेगी या नहीं, इसका भी भरोसा नहीं है.
सूचना-तकनीक के युग में विभिन्न माध्यमों से लोकलुभावने विज्ञापन आते रहेंगे, लेकिन वास्तव में काम कुछ होनेवाला नहीं. अलग राज्य के गठन के बाद से ही मांगों को पूरा कराने को लेकर हड़ताल, धरना-प्रदर्शन का दौर जारी है. संयुक्त बिहार के समय भी ऐसा ही माहौल था. यहां की जनता समस्याओं के मकड़जाल में फंसी है. खनिज संपदा से भरपूर राज्य के लोग आज भी गरीबी का दंश ङोल रहे हैं. आखिर सरकारें कब चेतेगी?
बाबू चंद साव, ई-मेल से
