अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा

हाल ही की पेरिस और फ्रांस की ताजा घटनाओं ने जहां पूरी दुनिया को सोचने पर मजबूर कर दिया है, वहीं यह अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे आतंकी खतरे को भी बता रही है. पेरिस की पत्रिका शार्ली एब्दो में प्रकाशित पैगंबर मोहम्मद साहब के कार्टून से खफा हुए कुछ आतंकियों के द्वारा पत्रकारों […]

हाल ही की पेरिस और फ्रांस की ताजा घटनाओं ने जहां पूरी दुनिया को सोचने पर मजबूर कर दिया है, वहीं यह अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे आतंकी खतरे को भी बता रही है.
पेरिस की पत्रिका शार्ली एब्दो में प्रकाशित पैगंबर मोहम्मद साहब के कार्टून से खफा हुए कुछ आतंकियों के द्वारा पत्रकारों की हत्या करने से अब देश के पत्रकारों को जान खतरे में नजर आ रही हैं. इस घटना के बाद बाद फ्रांस में एक समुदाय के खिलाफ विद्वेष भी दिखा. एक काटरून के लिए इतने पत्रकारों की हत्या करना किस धर्म में माफी के काबिल है.
आजकल इंसानियत पर धार्मिक मानिसकता हावी हो चुकी है. पूरे विश्व में धार्मिकता को लेकर लोग सजग हैं. कोई दूसरा व्यक्ति उनके धर्म को ठेस पहुंचाये, यह उन्हें कबूल नहीं. यही स्थिति फिल्म पीके को लेकर भी बनी.
इस फिल्म का जितना अधिक विरोध किया गया, उसे देखनेवालों की तादाद उसी रफ्तार से बढ़ी. भारत में इसका कारोबार तीन सौ करोड़ रुपये को भी पार कर गया. भारत में इस फिल्म का विरोध किया जाना अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे खतरे को दर्शाता है. सबसे बड़ी बात यह है कि मीडिया तो मानो तलवार की धार पर खड़ा है.
मीडिया द्वारा किसी भी धर्म से जुड़े विचार को संप्रेषित करने पर अधिक खतरा महसूस होता है. धर्म को सवालों से परे मान लिया गया है. इस बीच सवाल यह भी पैदा होता है कि आखिर अभिव्यक्ति की आजादी पर निरंकुशतापूर्वक हमला कब तक किया जाता रहेगा? मीडिया सरकार और जनता के बीच एक सेतु है. फिर इस सेतु को नष्ट कर लोगों को क्या मिलेगा? क्या इससे उनके दिल को शांति मिलेगी?
मनीष शर्मा, रांची

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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