अभिव्यक्ति के सवाल पर संदेह के पेच

धार्मिक हिंसा भड़काने, शत्रुता बढ़ाने, धर्म को अपमानित करने और भावनाओं को आहत करने को लेकर विशेष कानून हैं. लेकिन ये कानून नये नहीं हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करनेवाले हमारे कानून 1837 में बनाये गये थे. जहां तक मुङो याद पड़ता है, मेरे पुराने बॉस एमजे अकबर का पत्रकारिता के लिए एक ही […]

धार्मिक हिंसा भड़काने, शत्रुता बढ़ाने, धर्म को अपमानित करने और भावनाओं को आहत करने को लेकर विशेष कानून हैं. लेकिन ये कानून नये नहीं हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करनेवाले हमारे कानून 1837 में बनाये गये थे.
जहां तक मुङो याद पड़ता है, मेरे पुराने बॉस एमजे अकबर का पत्रकारिता के लिए एक ही नियम होता था. उन्हीं के शब्दों में यह नियम इस प्रकार था- ‘किसी भी विषय पर तुम जो लिखना चाहो, लिखो, पर कभी भी धर्म का मजाक न उड़ाओ.’ मुङो नहीं मालूम है कि उन्होंने ऐसा इसलिए कहा था कि वे चाहते थे कि उनका अखबार धर्मो के प्रति आदर दिखाये या फिर वे उन मुसीबतों से बचना चाहते थे, जो हमारे देश में धर्म का उपहास उड़ाने के कारण पैदा होती हैं. शायद उनके परहेज के पीछे ये दोनों ही कारण थे.
फ्रांस में साप्ताहिक शार्ली एब्दो पर हुए हमले के बारे में बिजनेस स्टैंडर्ड में टीएन नाइनन ने लिखा है, ‘कई समाजों, खासकर जो पश्चिमी प्रबोधन का हिस्सा हैं, में आहत करने की स्वतंत्रता सहित अभिव्यक्ति के अधिकार पर शायद ही कोई पाबंदी है, और अगर है भी तो बहुत कम. फ्रांस की क्रांति के दौरान जारी ‘मनुष्य के अधिकारों की घोषणा’ में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ‘मनुष्य के सर्वाधिक महत्वपूर्ण अधिकारों में एक’ मानते हुए शामिल किया गया था.’ हालांकि, उन्होंने आगे लिखा है, ‘सर्व धर्म समभाव की व्यापक परंपरा के कारण यह कल्पना करना भी कठिन है कि भारतीय अखबार या पत्रिकाएं पैगम्बर मोहम्मद का कार्टून यह जानते हुए भी छापेंगे कि इससे लाखों लोगों की भावनाओं को ठोस पहुंचेगी.’ यह बिल्कुल सही है, और अगर कोई दुस्साहसी संपादक ऐसा करने के बारे में सोचे भी, तो इससे होनेवाली परेशानियों के कारण शायद ही ऐसा करे. ऐसा करने पर हिंसा और धमकियों का ही नहीं, बल्कि कानूनी मुसीबतों का भी सामना करना पड़ सकता है.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दे पर भारत में हमेशा मुश्किलें आती रही हैं और जवाहरलाल नेहरू जैसा व्यक्ति भी इस मौलिक स्वतंत्रता को लेकर पसोपेश में रहे थे. हमारे संविधान के अनुच्छेद 19(1) ने भारतीयों को 26 जनवरी, 1950 को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान किया. इसके 15 महीने बाद नेहरू ने इस अधिकार के प्रावधानों से पीछे हटते हुए इसके साथ कई सीमाएं जोड़ दीं. भारत में आधा दर्जन कानून इस स्वतंत्रता को सीमित करते हैं. इनमें से कुछ तो बड़े अजीब हैं.
नाइनन अपने आलेख में कहते हैं, ‘इस मसले पर भारत का रुख अपेक्षाकृत जटिल है; अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार तो है, लेकिन यह असीमित नहीं है; भारतीय संविधान ‘शांति-व्यवस्था’ के साथ ही ‘शालीनता और नैतिकता’ जैसी लचीले आधारों पर इसे सीमित करता है. मित्र देशों के साथ संबंधों को कुप्रभावित करने की संभावना रखनेवाले लेख लिखना भी प्रतिबंधित है. सैद्धांतिक मुद्दे के अलावा एक व्यावहारिक समस्या यह है कि मित्र व शत्रु देशों की कोई स्वीकृत सूची नहीं है.’ धार्मिक हिंसा भड़काने, शत्रुता बढ़ाने, धर्म को अपमानित करने और भावनाओं को आहत करने को लेकर विशेष कानून हैं. लेकिन ये कानून नये नहीं हैं.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करनेवाले हमारे कानून 1837 में बनाये गये थे. जब थॉमस मैकॉले ने भारतीय दंड संहिता तैयार करना शुरू किया था, तब उसकी उम्र महज 33 वर्ष थी. यह संहिता कमोबेश पिछले 175 वर्षो से चली आ रही है. इससे यही पता चलता है कि आधुनिकता के सज-धज में रहने के बावजूद हम किस हद तक एक अपरिवर्तनशील संस्कृति हैं. औपनिवेशिक कानूनों की यह संहिता स्वतंत्र भारत में भी लागू है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि एक अंगरेज ने हमारा सटीक आकलन किया था, और बाहरी उत्प्रेरकों के प्रति हमारे व्यवहार और हमारी प्रतिक्रिया का अनुमान लगा लिया था. ऐसे में मैकॉले एक महान व्यक्ति सिद्ध होते हैं. वे भरोसे से 1837 में यह बता सकते थे कि हममें से कितने 1984, 1993 और 2002 में वहशी हो सकते हैं. भारतीय संविधान ने व्यापक और सार्वभौमिक वादे किये थे, लेकिन वे सब देश की सांप्रदायिक हिंसा की बलि चढ़ गये.
दुनिया में कुछ ऐसे देश हैं, जहां किसी तरह का संघर्ष नहीं है और धार्मिक मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर उनका नजरिया बिल्कुल स्पष्ट है. सऊदी अरब में एक युवक को 10 वर्ष के कारावास और एक हजार कोड़े मारने की सजा दी गयी है, जिसमें पहले 50 कोड़ों की किस्त इस महीने दी गयी है. उसके अपराधों में इसलाम को अपमानित करने से लेकर पिता की आज्ञा न मानने के अपराध शामिल हैं. सऊदी अरब धर्म के मामले में किसी तरह की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं देता है. मेरे विचार से ऐसी मनोवृत्ति किसी अतीत की बात है और आज के माहौल और सोशल मीडिया की उपलब्धता की स्थिति में ऐसी हठी मनोवृत्ति अधिक दिनों तक नहीं चल सकती है.
इस बहस की एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बहस में अगुवा रहनेवाले और अकसर इसका पक्ष लेनेवाले पत्रकारों के लिए मुद्दे के पहलुओं को स्पष्टता के साथ देख पाना आसान नहीं होता है. मुङो नहीं पता था कि शार्ली एब्दो ने सामी-विरोधी रुख (एंटी-सेमेटिज्म) के लिए एक पत्रकार को निकाल दिया था. इसलाम पर हमला करने के पत्रिका के उत्साही तेवर को देखते हुए यह जानकारी मेरे लिए आश्चर्यजनक थी.
डेली ‘टेलीग्राफ’ ने 2009 में लिखा था कि साइन उपनाम से लिखनेवाले 80 वर्षीय मौरिस साइनेट पर व्यंग्य पत्रिका शार्ली एब्दो में जुलाई में लिखे एक लेख में ‘नस्ली घृणा उकसाने’ का आरोप है. इस लेख ने पेरिस के बौद्धिकों के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप का माहौल बना दिया था और अंतत: उन्हें पत्रिका से बाहर कर दिया गया.’ साइन ने फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति सार्कोजी के बेटे की एक यहूदी लड़की से सगाई के बाद उनके यहूदी बनने की अफवाह पर टिप्पणी की थी कि ‘यह बच्चा जीवन में बहुत आगे जायेगा’.
एक वरिष्ठ टिप्पणीकार ने इसे यहूदियों की सामाजिक सफलता के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त बताया था. शार्ली एब्दो के संपादक फिलीप वाल ने उनसे क्षमा मांगने को कहा, पर साइन ने कहा कि इसके बजाय मैं अपना अंडकोष काटना पसंद करूंगा. दार्शनिक बर्नार्ड हेनरी लेवी सहित प्रमुख बौद्धिकों ने साइन को निकालने के फैसले का समर्थन किया था, लेकिन उदारवादी वाम के एक हिस्से ने साइन का समर्थन किया था.
पत्रकार साइन को निकालने का मामला भले ही एक ढोंग प्रतीत हो, लेकिन हम सब की तरह शार्ली एब्दो को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर अपने कुछ संदेह थे.
आकार पटेल
वरिष्ठ पत्रकार
aakar.patel@me.com

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