चुनाव में आंखों पर चढ़े अदृश्य चश्मे

झारखंड चुनावी बुखार की गिरफ्त में है. सबकी आंखों पर एक अदृश्य चश्मा चढ़ा हुआ है. कल चाय की दुकान पर पकौड़ी खाते दो दोस्त इन चश्मों के बारे में बात कर रहे थे.. ‘का भइया, बड़ा हवा में उड़ रहे हो. कौन वाला चश्मा लगाये हो?’ ‘उड़ रहे हो का का मतलब?’ ‘अच्छा चलो […]

झारखंड चुनावी बुखार की गिरफ्त में है. सबकी आंखों पर एक अदृश्य चश्मा चढ़ा हुआ है. कल चाय की दुकान पर पकौड़ी खाते दो दोस्त इन चश्मों के बारे में बात कर रहे थे..

‘का भइया, बड़ा हवा में उड़ रहे हो. कौन वाला चश्मा लगाये हो?’

‘उड़ रहे हो का का मतलब?’

‘अच्छा चलो इ बताओ, तुमको अपने चश्मा से का-का दिख रहा है?’

‘हमको तो दूगो रंग और एगो फूल दिख रहा है, और क्या?’

‘ठीके बूझ रहे थे हम. तुम भी आ गये न अच्छे दिन के फेरा में.’

‘इ का कह रहे हो भाई!’

‘फंस गये हो तुम. टीवी-अखबार देख-देख कर दूगो रंग और फूल दिखानेवाला चश्मा ले आये हो. अब तो तुमको हर जगह चायवाला और लंबा-लंबा भाषण देनेवाला ही दिखेगा.’

‘अरे जानते हो, एकठो दूसरा चश्मा भी था. जब उसको ट्राई किया तो हमको तीन-तीन रंग और एक तना हुआ थप्पड़ दिखायी दिया. सच कहें तो हमको तो बाबूजी का थप्पड़ का याद आ गया. मन बहुते घबरा गया था.’

‘अरे बुद्धू, ऊ थप्पड़ थोड़े ही था. तुमको दबंग फिलिम का डायलोग याद नहीं आया- थप्पड़ से डर नहीं लगता है बाबूजी, हमको तो प्यार से डर लगता है. ऊ तो प्यार का हाथ है. साथी का हाथ. सबसे पुराना और सबसे मजबूत. सबके सिर पर आशीर्वाद जैसा. ऊ गाना याद है न- साथी हाथ बढ़ाना, साथी रे.. बस उहे गाना वाला हाथ. ’

‘अरे ई तो बहुते पुराना गाना है. तुम भी इतिहासे पढ़ावे लगे हो. अरे नया जमाना है. हम पुराना चीज नहीं चाहते हैं. हम जो चश्मा लिये हैं ना, उ एकदम से चम-चम कर रहा था. एकदमे नया. इसको लेने के लिए धक्का-मुक्की करना पड़ा था, तब कहीं जा कर इ चश्मा मिला.’

‘हो गया ना गड़बड़. भीड़े देख के तुम भटकीये गये ना और ई चम-चम के फेर में पड़ गये. अरे उहां तो औरो तरह का चश्मा था. उसमें से कोईयो ले लेना था.’

‘अरे हम तो सबको एक -एक बार ट्राई करके देखे थे. जानते हो जब हम एक चश्मा लगाये तो हमको सिर्फ हरा-हरा दिख रहा था और उसमें भी मेले में मिलनेवाला एक तीर-धनुष दिखा था. दूसरा चश्मा से केवल लाल-लाल दिख रहा था और कुछ औजार भी दिखा था. का कहें भइया, लाल रंग देखते ही खतरा बुझाने लगता है. डर लगने लगता है.’

‘अब का कहें तुमको. अब का हो सकता है? अब जो दिखता है देखो. अब तुमको कुछो दूसरा नहीं दिखने वाला है. हम जो जानते है कि जब चश्मा उतरेगा तो बहुते पछताओगे. ’

इस बातचीत को सुनने के बाद मुङो लगा हर आदमी का चश्मा होता है लेकिन बहुत से लोग झांसे या भुलावे में भी आ जाते हैं. आजकल बहलाने-फुसलाने का प्रचार जोरों पर जो है.

राकेश कुमार

प्रभात खबर, रांची

rakesh.kumar@prabhatkhabar.in

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