भारत समेत पूरी दुनिया आज ऑनलाइन होने को आतुर है. हमारे ‘प्रधान सेवक’ पूरे देश को इंटरनेट से जोड़ना चाहते हैं, पर क्या भारत की शहरी और ग्रामीण आबादी के पास इतने उपकरण हैं, जिससे यह कार्य आसानी से किया जा सके? सरकार इतने उपकरण उपलब्ध करा सकेगी? क्या कंप्यूटर की जानकारी कतार के सबसे अंतिम व्यक्ति तक पहुंच पायेगी? इन सवालों को सोचकर चिंता होती है.
लोकतांत्रिक देश का सबसे बड़ा पर्व चुनाव है. चुनाव संपन्न कराने में ही इतनी कठिनाई होती है. झारखंड में दूसरे चरण के मतदान में चुनाव अधिकारी के बयान से बड़ी आहत पहुंची. कैसे महिला कर्मियों को अंधेरे में मीलों पैदल चलना पड़ा, बिना लाइट जलाये और बिना कुछ बोले. बस इसलिए कि उपद्रवी आघात न कर दें.
चुनाव संपन्न कराने में सरकार करोड़ों रुपये बहा देती है. पुलिसकर्मी और अन्य सरकारी कर्मचारी जान पर खेल कर चुनाव संपन्न कराते हैं. चुनाव के दौरान कितनी जानें चली जाती हैं. ऐसे लोगों के घर-परिवार के विषय में भी जरा सोचिए. जवानों को कितनी मशक्कत करनी होती है, इसकी कल्पना करना भी कठिन है. क्या इस ओर सरकार का ध्यान नहीं जाता? अगर समग्र रूप से कहें तो पूरी चुनाव प्रक्रिया डर, हताहत लोगों की खबरों, मुश्किल और परेशानियों से भरा होता है. फिर भी आयोग और सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती.
मेरे खयाल से इस परेशानी का एक ही हल है. वह यह कि चुनाव को पूरी तरह ऑनलाइन कर दिया जाए. इससे डरे-सहमे मतदाता भी मतदान कर पायेंगे. जो जहां है, वो वहीं से मतदान करेगा. साथ ही, मतदान में पारदर्शिता भी आयेगी.
सुमित कुमार, दिल्ली
