उम्मीद की जानी चाहिए कि जनता परिवार के एक होने की ताजा कोशिश, पहले हासिल हुए सबकों को ध्यान में रखते हुए सुशासन, समावेशी या न्यायपूर्ण विकास और सामाजिक-धार्मिक सद्भाव पर आधारित एक प्रतिरोधी राजनीति खड़ा कर सकेगी. अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो संभव है कि अन्य पार्टियां भी विपक्ष की एकता को मजबूती देनेवाले इस प्रयास के साथ जुड़ेंगी.जनता परिवार के पूर्व सदस्यों की एक बैठक बीते चार दिसंबर, 2014 को मुलायम सिंह यादव के निवास-स्थान पर हुई. इसमें समाजवादी पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड), राष्ट्रीय जनता दल, इंडियन नेशनल लोक दल, जनता दल (सेकुलर) और समाजवादी जनता पार्टी के नेता शामिल थे. बैठक के बाद नीतीश कुमार ने मीडिया को बताया कि इन दलों ने संसद के भीतर और बाहर मिल कर काम करने का संकल्प लिया है तथा इनका लक्ष्य एक पार्टी के रूप में एकजुट होने का है, जिसकी निर्माण-प्रक्रिया के निर्धारण के लिए मुलायम सिंह को अधिकृत किया गया है.
इस महत्वपूर्ण घटना पर खूब बहसें हुईं और मीडिया में टिप्पणियां की गयीं. स्वाभाविक रूप से भारतीय जनता पार्टी ने इस कदम को निर्थक बताते हुए खारिज कर दिया. इसके प्रवक्ता ने जनता परिवार में टूट के इतिहास को उद्धृत करते हुए दावा किया कि पार्टियों का ऐसा समूह अपने आंतरिक विरोधों और अंतर्विरोधों को दूर नहीं कर सकता, इसलिए पहले की तरह ही ये फिर से बिखर जायेंगे. उनका यह भी मानना था कि नरेंद्र मोदी के विजय-अभियान से घबराये सत्ता-लोलुप दलों की यह एक बदहवास कोशिश है.
भारतीय जनता पार्टी के जो भी आरोप हों, यह समय इस नयी राजनीतिक कोशिश के समुचित मूल्यांकन का है. पहली बात यह कि किसी भी लोकतंत्र का यह बुनियादी आधार है कि उसमें एक मजबूत विपक्ष की मौजूदगी हो, जो राष्ट्र के व्यापक हित में सरकार की नीतियों और कार्यो पर पूरी जिम्मेवारी के साथ नजर रखे और समय-समय पर उसकी समीक्षा करे. निश्चित रूप से विपक्ष आज बिखरा हुआ और कमजोर है. इसलिए इसके विभिन्न घटकों के एकताबद्ध होकर इस स्थिति से उबरने तथा सत्ताधारी पार्टी के कार्यो की समीक्षा की क्षमता को बढ़ाने के किसी भी प्रयास का स्वागत किया जाना चाहिए.
दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि एक होने के इच्छुक जनता परिवार के सभी घटकों में निश्चित और स्पष्ट समानताएं हैं. ये सभी 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए हुए संघर्ष से निकले हैं. ये उस दशक के अंतिम वर्षो में आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी को पराजित कर केंद्र की सत्ता में आयी एक राजनीतिक इकाई जनता पार्टी में शामिल थे. बाद के आपसी राजनीतिक मतभेद और प्रतिद्वंद्विता के बावजूद ये एक ही विचारधारात्मक सूत्र से जुड़े हुए हैं, जिसे लोकतांत्रिक समाजवाद कहा जा सकता है. वर्तमान में ये सभी दल कई मसलों को लेकर एकजुट हैं, जो देश की बहुत बड़ी आबादी को प्रभावित कर रहे हैं.
तीसरी बात यह कि निश्चित रूप से इस परिघटना का एक ठोस रणनीतिक आधार है. पिछले आम चुनाव में देखा गया कि अगर विपक्ष विभाजित है, तो भाजपा जन-समर्थन के कम अनुपात के बावजूद बहुमत हासिल कर सकती है. धार्मिक ध्रुवीकरण के बहुत व्यापक और आक्रामक प्रचार अभियान के बावजूद भाजपा ने भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में किसी दल द्वारा पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के अब तक के सबसे कम मत-प्रतिशत (मात्र 31 फीसदी) के समर्थन के आधार पर 282 सीटें हासिल की. ऐसा हो सकने का कारण यह था कि उसका विरोध कर रही सभी पार्टियां- विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार में- बंटी हुई थीं. अगर विपक्षी एकता आगे बढ़ती है, तो यह सत्तारूढ़ दल के लिए एक बड़ी चुनौती होगी. लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद बिहार और उत्तर प्रदेश में हुए उप-चुनावों में यह देखा भी जा चुका है.
चौथी बात है कि वर्तमान सरकार, जहां पूरी शक्ति प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय में केंद्रित है, के काम-काज और उद्देश्यों से जुड़े कई ऐसे मसले हैं, जिन्हें मजबूती के साथ उठाने की जरूरत है. देश ने देखा कि किस तरह काले धन के मसले पर प्रधानमंत्री द्वारा किये गये वादों पर भी धोखा दिया गया. चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने स्पष्ट कहा था कि वे विदेशों में जमा काला धन को वापस लाकर हर भारतीय नागरिक, खासकर गरीबों, की जेब में 15 से 20 लाख का उपहार देंगे. गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि सरकार बनने के महज 100 दिनों के भीतर ही विदेशों में जमा काले धन को देश में वापस लाया जायेगा. छह महीने बाद सरकार ने माना है कि उसे यह भी पता नहीं है कि विदेशों में कितना काला धन जमा है! इससे भी गंभीर बात यह है कि सरकार ने बड़ी ढिठाई से यह स्वीकार किया है कि राजनीतिक वादों और आर्थिक प्रक्रियाओं में कोई अंर्तसबंध नहीं होता है.
नयी सरकार की आर्थिक नीतियों की दिशा भी गंभीर चिंता का विषय है. इस बात के अकाट्य सबूत हैं कि यह सरकार बेहतर जीवन तथा मध्य वर्ग, गरीबों और वंचितों के बड़े हिस्से की जरूरतों की कीमत पर बेमानी साबित हो चुके ‘शाइनिंग इंडिया’ के पचड़े में फिर से पड़ रही है. बुलेट ट्रेन, स्मार्ट सिटी, देश के पहले से ही विकसित क्षेत्रों में बनाये जा रहे नेशनल हाइवे और औद्योगिक गलियारे सरकार की वित्तीय परिकल्पना में भरे पड़े हैं, जबकि बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, बेरोजगारी बढ़ती ही जा रही है और सामाजिक क्षेत्र में धन की कटौती की जा रही है. विकास की यह अभिजात्यवादी दृष्टि बढ़ते सांप्रदायिक कलह के माहौल में लागू की जा रही है. लगभग हर रोज सरकार का कोई वरिष्ठ सदस्य धार्मिक विद्वेष और संघर्ष को बढ़ाने के उद्देश्य से कोई भड़काऊ बयान देता है, ताकि धार्मिक ध्रुवीकरण के लक्ष्य की प्राप्ति हो सके. हद तो तब हो गयी, जब एक केंद्रीय मंत्री ने भारतीय जनता पार्टी का समर्थन नहीं करनेवालों को ‘हरामजादा’ तक कह दिया.
यह सही बात है कि जनता परिवार को एकजुट करने के पहले के प्रयास अधिक दिनों तक नहीं कायम रह सके थे और उनमें बहुत जल्दी ही फूट पड़ जाती थी, लेकिन यह बात भी उतनी ही सही है कि हम इतिहास के बंदी बन कर नहीं रह सकते. इतिहास हमें सबक देता है, जिनकी अवहेलना कर हम अपना ही नुकसान करते हैं.
यह उम्मीद की जानी चाहिए कि जनता परिवार के एक होने की ताजा कोशिश पहले हासिल हुए सबकों को ध्यान में रखते हुए सुशासन, समावेशी या न्यायपूर्ण विकास और सामाजिक-धार्मिक सद्भाव पर आधारित एक प्रतिरोधी राजनीति खड़ा कर सकेगी. अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो यह भी पूर्णतया संभव है कि इस सरकार के काम-काज के प्रति ऐसा ही गंभीर असंतोष रखनेवाली और समान सोच रखनेवाली अन्य पार्टियां भी विपक्ष की एकता एवं प्रभाव को अधिकतम मजबूती देनेवाले इस प्रयास के साथ जुड़ेंगी.
पवन के वर्मा
सांसद एवं पूर्व प्रशासक
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