धान उपजानेवाले झारखंड के किसान परेशान हैं. सरकार धान खरीद नहीं पा रही है क्योंकि उसके पास पैसे नहीं हैं. यह पहला मौका है जब पैसे के अभाव में किसानों से धान की खरीद नहीं हो पायेगी. ऐसा नहीं है कि इस मद में पैसा नहीं है. पैसा है लेकिन सरकार के 324 करोड़ रुपये बाजार में फंसे हुए हैं. बड़ा हिस्सा मिल मालिकों के पास बकाया है.
सरकार के 161 करोड़ रुपये का भुगतान राइस मिल मालिक नहीं कर रहे हैं. अगर ये पैसे उन्होंने दिये होते तो इससे किसानों का धान खरीद लिया जाता. अन्य जगहों पर भी पैसे फंसे हैं. यह सरकार के काम करने का तरीका है. अफसर लगातार पत्र लिख रहे हैं, लेकिन राइस मिल मालिकों पर इसका असर नहीं पड़ रहा. उन्हें धान मिल गया लेकिन वे पैसे नहीं दे रहे हैं. इसका खमियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है. अगर किसानों के धान की खरीद सरकार नहीं करती है तो बाद में मजबूरन कम दाम पर बिचौलियों के हाथों बेचना पड़ेगा. किसानों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा. इन हालात के लिए सरकार और अफसर दोषी हैं.
पैसा वसूलने का गंभीर प्रयास नहीं किया गया. दो साल से सरकारी पैसा दाब कर मिल मालिक बैठे रहें और कार्रवाई न हो, तो इसका यही संकेत जायेगा कि सभी मिले हुए हैं. एफआइआर करने की धमकी दी जा रही है. बेहतर होता कि एफआइआर कर पैसे की वसूली की जाती. या तो सरकार का पैसा राइस मिल मालिक सूद समेत दें या फिर जेल जायें. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा. सरकारी अफसरों के काम करने के इसी तरीके के कारण 14 साल में झारखंड का यह हाल हो गया है.
कोई दूसरा राज्य होता तो राइस मिल मालिकों के कलेजे पर चढ़ कर पैसा वसूल लिया होता. बहाना बनाने से हल नहीं निकलता. राज्य चलता है नियम-कानून से. इसका सीधा असर गरीब लोगों पर पड़ेगा, जिन्होंने अपनी सारी पूंजी खेती में लगा दी है. जब धान तैयार हो गया तो उसे खरीदनेवाला कोई नहीं मिल रहा. सरकार गौर करे कि अगर किसान अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर जायें या उनका गुस्सा राइस मिल मालिकों पर उतरने लगे, तो राज्य में अशांति फैल जायेगी. अब भी सरकार चेते और दोषी अफसरों को भी नहीं छोड़े, जिन्होंने पैसा वसूलने में लापरवाही बरती है.
