मोदी सरकार ने सत्ता संभालने के साथ ही मनमोहन सरकार द्वारा राज्यपाल बनाये गये राजनीतिक व्यक्तियों को हटा कर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की नियुक्ति की थी.
लेकिन, पद के राजनीतिक उपयोग के मामले में भाजपा सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपाल भी पूर्ववर्ती सरकार द्वारा बनाये गये राज्यपालों की राह पर ही चलते दिख रहे हैं. यह भी एक विरोधाभास है कि संवैधानिक पद होने के बावजूद राज्यपाल की नियुक्ति, भूमिका और पद से हटाने की प्रक्रिया राजनीतिक है और इस स्थिति में बदलाव की कोशिश किसी सरकार ने नहीं की है. राज्यपाल को लेकर उठे लगभग सभी विवादों की जड़ में यही विरोधाभास है.
मनमोहन सरकार के द्वारा नियुक्त कुछ राज्यपालों ने तो इस पद का उपयोग साफ तौर पर अपनी राजनीतिक निष्ठा प्रदर्शित करने के लिया किया था. इस संदर्भ में कर्नाटक के पूर्व राज्यपाल हंसराज भारद्वाज द्वारा तत्कालीन भाजपा सरकार के एक मंत्री का सीधे इस्तीफा मांगना और गुजरात की पूर्व राज्यपाल कमला बेनीवाल द्वारा राज्य विधानसभा से पारित विधेयकों पर अनुमति नहीं देना उल्लेखनीय उदाहरण हैं. अब उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने बयान दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या विवाद के शांतिपूर्ण हल के लिए एक योजना पर काम कर रहे हैं, जिसके तहत अगले पांच वर्षो में इस मुद्दे का स्थायी समाधान हो जायेगा.
अयोध्या मसला न्यायालय के विचाराधीन है, और अगर केंद्र सरकार इसके समाधान के लिए प्रयासरत है तो इस बारे में देश को बताने का जिम्मा उसका है, न कि किसी राज्यपाल का. अयोध्या विवाद से ऊपजी हिंसा से देश बीते कई दशकों से त्रस्त है. अगर राज्यपाल गंभीरता से एक सरकारी पहल की जानकारी देना चाहते थे, तो वे आधिकारिक बयान या विज्ञप्ति जारी कर सकते थे. इस विवादित मसले में प्रमुख भूमिका निभानेवाले संगठन विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में यह बयान दिया जाना राम नाईक की मंशा को संदेहास्पद बनाता है. राज्यपाल का पद एक संवैधानिक पद है और इस पर आसीन व्यक्ति को दलगत भावना से ऊपर उठ कर काम करना चाहिए. इस पद के बारे में सरकारिया आयोग के सुझावों, खास कर राजनेताओं को राज्यपाल बनाने से संबंधित, पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए.
