झारखंड राज्य गठित होने के बाद हो रहे तीसरे चुनाव के प्रथम चरण के मतदान के लिए नामांकन प्रक्रिया पूरी हो गयी है. साथ ही, दूसरे चरण की 20 सीटों के लिए अधिसूचना जारी हो चुकी है. प्रथम चरण की 13 सीटों पर प्रत्याशियों की भरमार है, अब यह मतदाताओं पर निर्भर है कि वे कितनी समझदारी से इनमें से सही प्रत्याशियों का चुनाव करते हैं.
झारखंड के 14 साल के इतिहास में, मतदाताओं ने अलग-अलग कारणों से हर दल से कम या ज्यादा प्रेम दिखाया है. नतीजा राज्य में किसी एक पार्टी को कभी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. मिली-जुली सरकारों ने राज्य का भला कभी नहीं किया. हां, झारखंड के नेता जरूर धनवान होते गये. पहले चरण की 13 सीटों में तमाम सांस्कृतिक विषमताओं के बावजूद एक समानता जरूर है, वह है इन क्षेत्रों का पिछड़ापन. राज्य के छह जिलों में स्थित इन 13 सीटों के अधिकांश क्षेत्र जंगल-पहाड़ों से घिरे हुए हैं.
लोहरदगा और लातेहार को छोड़ दें तो बाकी के चार जिलों की सीमा दूसरे राज्यों से मिलती है. आर्थिक और शैक्षिक दृष्टि से ये सभी जिले बेहद पिछड़े हैं, भले ही राज्य का सबसे प्रतिष्ठित विद्यालय नेतरहाट इसी इलाके में है. गरीबी-बेरोजगारी और पलायन की मार ङोलने वाले इन इलाकों में नक्सलियों-अपराधियों का अपना अलग साम्राज्य है. नक्सलग्रस्त चतरा में आठ प्रत्याशी हैं, तो डाल्टनगंज में 28 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं.
कुल मिला कर पहले चरण में 228 प्रत्याशी मैदान में हैं. हो सकता है कि नाम वापसी और स्क्रूटनी के बाद इस संख्या में कुछ कमी आ जाये. उम्मीदवारों की इस भीड़ में अब मतदाताओं के सामने संकट है कि वे किसे अपना प्रतिनिधि चुनें. मतदाता जिसको चुन लेगा, उसी के हाथ में अगले पांच साल के लिए झारखंड की तकदीर होगी. शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े इलाके में अपने पक्ष में मतदान कराना अपेक्षाकृत आसान माना जाता है. ऐसे इलाकों में जातीय समीकरण तो काम करता ही है, धन बल और बाहुबल भी खूब चलता है. वर्षो से मतदाताओं को लुभाने के लिए ये तरीके आजमाये जाते रहे हैं. लेकिन उम्मीद की जा रही है कि पिछले 14 वर्षो से ठगी जा रही राज्य की जनता अब समझदार हो गयी होगी और इस बार योग्य व्यक्ति को ही अपना प्रतिनिधि चुनेगी.
