लोकतंत्र में जनता को स्वाभाविक अपेक्षा होती है कि सत्ता परिवर्तन के साथ सरकार का रवैया भी बदलेगा. लेकिन, काले धन पर केंद्र सरकार के टाल-मटोल वाले रुख के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) को दी गयी सलाह से नहीं लगता कि नरेंद्र मोदी सरकार का रवैया अपने पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार से बहुत अलग है.
जेटली ने सीएजी को हिदायत दी है कि उन्हें स्वयं को लेखा-जोखा के काम तक ही सीमित रखते हुए किसी तरह की सनसनी फैलाने या सुर्खियों में आने से बचना चाहिए. सीधे तौर पर इस बयान में कोई गलती नहीं है.
यह बात सरकार और सभी संवैधानिक संस्थाओं पर समान रूप से लागू होती है. परंतु, बीते कुछ वर्षो के राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में इसे देखें, तो एक चिंताजनक तस्वीर उभरती है. यूपीए सरकार के दौरान जब सीएजी ने 2जी स्पेक्ट्रम, कोयला खदानों के आवंटन और कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन में हुए घोटालों को उजागर किया था, तब कांग्रेसी नेता व मंत्री सीएजी पर सनसनी फैलाने तथा आधारहीन आकलन करने का आरोप लगा रहे थे.
उस वक्त भाजपा नेताओं ने सीएजी का बचाव करते हुए सत्ता पक्ष के ऐसे बयानों को जांच में बाधा पहुंचानेवाला बताया था. सीएजी की रिपोर्ट के अपुष्ट आंकड़ों को भाजपा ने संसद से सड़क तक उछाला, जिससे अपने कामकाज और रवैये के चलते अलोकप्रिय हो रही यूपीए सरकार की बची-खुची साख भी ध्वस्त हो गयी. भाजपा को इसका बड़ा फायदा आम चुनाव में मिला. सीएजी एक संवैधानिक संस्था है और नियमों के तहत वह अपनी रिपोर्ट संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) को सौंपती है.
पीएसी उसे समीक्षा के बाद लोकसभा अध्यक्ष को सौंप देती है. पांच महीने पुरानी मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान सीएजी की ओर से अब तक ऐसा कोई बयान नहीं आया है, जिससे जेटली या किसी मंत्री को ऐसी सीख देने की जरूरत पड़ी हो. जाहिर है, हमारे देश की यह राजनीतिक संस्कृति बन गयी है कि जब कोई पार्टी विपक्ष में होती है, तब उसके तेवर अलग होते हैं और जब वह सत्ता हासिल करती है तो बिल्कुल भिन्न बर्ताव करती है. लोकतंत्र की बेहतरी के लिए जरूरी है कि पार्टियां किसी मुद्दे पर अपना रुख तय करने से पहले उसके तमाम पहलुओं पर गंभीरता से विचार करे, ताकि सत्ता में पहुंचने पर इसे बदलना न पड़े.
