।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।
(अर्थशास्त्री)
मोदी सरकार ने श्रम कानून को सरल बनाने का मन बनाया है. अभी तक व्यवस्था थी कि 20 से अधिक श्रमिकों को रोजगार देनेवाली फैक्ट्री पर फैक्ट्रीज एक्ट लागू होगा. अब इसे 40 से अधिक श्रमिकों को रोजगार देनेवाली फैक्ट्री पर लागू किया जायेगा. एक तिमाही में ओवर टाइम की अवधि को 50 से बढ़ा कर 100 घंटे तक कर दिया गया है. साथ-साथ सरकार ने एपरेंटिस एक्ट का विस्तार किया है. इस कानून के अंतर्गत उद्योगों को नवशिक्षितों को ट्रेनिंग देना अनिवार्य होता है.
इनका वेतन आंशिक रूप से सरकार वहन करती है. इन कानूनों के माध्यम से नवशिक्षितों को रोजगार की ट्रेनिंग मिलती है और इनके रोजगार के अवसर खुलते हैं. एपरेंटिस एक्ट के दायरे में 500 प्रकार के नये प्रतिष्ठानों को लाया जायेगा. इससे नवशिक्षितों को ट्रेनिंग पाने के तमाम अवसर खुलेंगे. सरकार के इन कदमों का स्वागत करना चाहिए.
लेकिन, श्रम कानूनों के प्रमुख अवरोधों पर फिलहाल सरकार ने चुप्पी साध रखी है. सौ से अधिक श्रमिकों को रोजगार देनेवाली कंपनी को बंद करने के पहले श्रम विभाग से स्वीकृति लेनी होती है. इन्हें श्रम विवाद कानून के दायरे से बाहर कर दिया जाये, तो इनके लिए श्रमिकों को बर्खास्त करना आसान हो जायेगा. ठेकेदारों के माध्यम से काम करना भी आसान बनाया जा सकता है.
उद्योगों को श्रमिकों के संबंध में लचीला रुख अपनाने की छूट देनी चाहिए. इन कानूनों से वर्तमान में कार्यरत श्रमिकों की रक्षा होती है जो कि ठीक है. परंतु इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि नये श्रमिकों को रोजगार देने का प्रेत्साहन दिया जाये. अंतत: रोजगार डंडे के बल पर नहीं, बल्कि आर्थिक गणित के बल पर उत्पन्न होंगे.
छोटे उद्योगों को इन श्रम कानूनों से जल्द छुटकारा दिलाना चाहिए. इससे इनकी उत्पादन लागत ज्यादा आती है. सस्ता श्रम उपलब्ध होने एवं श्रमिकों से सख्ती से काम लेने की छूट होने से इनके लिए बड़े उद्योगों का सामना करना आसान हो जायेगा. श्रम कानून को सख्ती से लागू करने से रोजगार घटते हैं. कई देशों में ऐसा करने से बेरोजगारी में वृद्घि हुई. यूरोपियन यूनियन में जिन देशों में श्रम बाजार लचीले थे, उनमें 2008 की मंदी का प्रभाव कम हुआ. जर्मनी में बेरोजगारी भत्ते में कटौती की गयी, जिससे कंपनियों पर वेतन का कुल भार कम हुआ और रोजगार में वृद्घि हुई. बेल्जियम, फ्रांस, ग्रीस, इटली, पुर्तगाल, स्पेन तथा नीदरलैंड ने श्रमिकों को बर्खास्त करने के नियमों को सरल बनाया है.
श्रम कानूनों के सरलीकरण की इस सार्थकता के बावजूद अपने देश में इससे बेरोजगारी पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा. बेरोजगारी की समस्या बहुत विकराल है. देश की आबादी लगभग सवा अरब है. इसमें लगभग 60 करोड़ कार्य करने के इच्छुक वयस्क होंगे. संगठित क्षेत्र के तीन करोड़ को छोड़ दें, तो शेष 57 करोड़ को संगठित क्षेत्र में रोजगार देना है. प्राइवेट कंपनियों पर लागू श्रम कानून में ढील देने से यहां वर्तमान में एक करोड़ के स्थान पर सवा या डेढ़ करोड़ लोगों को रोजगार मिल जाये, तो भी हमारी स्थितियों में यह ऊंट के मुंह में जीरा ही होगा.
केवल श्रम कानून के सरलीकरण से काम नहीं चलेगा. रोजगार सृजन को सीधे प्रोत्साहन देना होगा. मनरेगा पर लगभग 40 हजार करोड़ रुपये प्रति वर्ष खर्च हो रहे हैं. इस रकम को यदि 40 हजार रुपये प्रति वर्ष की दर से उद्यमियों को नये रोजगार पर सब्सिडी दी जाये, तो एक करोड़ रोजगार पैदा हो सकते हैं. सरकार द्वारा तमाम कल्याणकारी योजनाओं पर लगभग 500 हजार करोड़ रुपये प्रति वर्ष खर्च किये जा रहे हैं. इन्हें बंद करके रोजगार सब्सिडी दी जाये, तो 12 करोड़ रोजगार उत्पन्न हो सकते हैं. 40,000 रुपये प्रति वर्ष की सब्सिडी का अर्थ होगा कि श्रमिकों को दिये जानेवाले 6,000 रुपये प्रति माह के वेतन में उद्यमी पर लगभग 3,000 का ही भार पड़ेगा. शेष 3,000 रुपये सरकार देगी.
रोजगार सृजन को प्रोत्साहन दिये बगैर श्रम कानूनों के सरलीकरण के घातक परिणाम होंगे. वर्तमान में कार्यरत श्रमिकों के वेतन में कटौती हो जायेगी, परंतु पर्याप्त नये रोजगार उत्पन्न नहीं होंगे. एक अध्ययन के मुताबिक मोजामबीक में काजू उत्पादन के निजीकरण के कारण जिन लोगों के रोजगार छिने, वे अधिकतर बेरोजगार ही बने रहे. निजीकरण के कारण नये रोजगार उत्पन्न नहीं हुए. मेरे एक सहपाठी गोरखपुर स्थित सरकारी फर्टिलाइजर कंपनी में कार्यरत थे. कंपनी बंद हो गयी और वे 15 साल से घर बैठे पूरा वेतन उठा रहे थे.
सरकार को चाहिए कि सभी सरकारी कर्मियों की कार्यकुशलता का स्वतंत्र एजेंसी द्वारा मूल्यांकन कराये और हर वर्ष सबसे कम अंक पानेवाले एक प्रतिशत कर्मियों को बर्खास्त कर दे. प्राइवेट कंपनियों में कार्यरत अधिकारी व श्रमिक फिर भी कुछ काम करते हैं. सरकारी कर्मियों में न तो अफसर काम करते हैं न ही कर्मचारी. अत: श्रम सुधारों को सबसे पहले सरकारी कर्मियों पर ही लागू करना चाहिए.
