संघ और सनातनी परंपरा

आपके लोकप्रिय अखबार के 30 सितंबर के पत्र स्तंभ में डॉ वीरेंद्र साहू का ‘विनाशकारी नहीं, कल्याणकारी है संघ’ शीर्षक पत्र पढ़ा. हम इस बात से सहमत तो हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विनाशकारी नहीं, कल्याणकारी है, परंतु इस बात से सहमत नहीं है कि वह सनातन परंपरा का वाहक है. संघ सनातन नहीं, मध्ययुगीन […]

आपके लोकप्रिय अखबार के 30 सितंबर के पत्र स्तंभ में डॉ वीरेंद्र साहू का ‘विनाशकारी नहीं, कल्याणकारी है संघ’ शीर्षक पत्र पढ़ा. हम इस बात से सहमत तो हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विनाशकारी नहीं, कल्याणकारी है, परंतु इस बात से सहमत नहीं है कि वह सनातन परंपरा का वाहक है.

संघ सनातन नहीं, मध्ययुगीन अथवा पौराणिक परंपरा का वाहक है. मध्ययुग में राजा भोज के समय में पुराणों की रचना हुई थी. राजा भोज ने ऐसे लेखकों को चेतावनी भी दी थी कि ग्रंथ अपने नाम से लिखो, ऋषियों के नाम से नहीं. वेद व्यास की दो ही मूल रचनाएं गीता सहित महाभारत एवं वेदांत दर्शन हैं.

संघ इसी पुराण परंपरा का वाहक है. इसे ही वह सनातन परंपरा कहता है, जबकि वेद की परंपरा सनातन है, क्योंकि यह आदि सृष्टि से आरंभ हुई है और आज भी उतनी ही प्रासंगिक व व्यावहारिक है.

संध्या कुमारी, मेकॉन कॉलोनी, रांची

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