इंटरनेट पर सजा बाजार, व्यापारी बेकरार

राजीव रंजन झा संपादक, शेयर मंथन इंटरनेट पर खरीदारी आज की हकीकत है और इस पर कृत्रिम बंदिशें लगाने की कोशिशें कामयाब नहीं होंगी, लेकिन अराजक अस्पष्टता के बदले साफ-सटीक नियमन और निगरानी की जरूरत को भी नकारा नहीं जा सकता. ऑनलाइन खरीदारी की वेबसाइट ‘फ्लिपकार्ट’ ने छह अक्तूबर को ‘बिग बिलियन सेल’ की घोषणा […]

राजीव रंजन झा

संपादक, शेयर मंथन

इंटरनेट पर खरीदारी आज की हकीकत है और इस पर कृत्रिम बंदिशें लगाने की कोशिशें कामयाब नहीं होंगी, लेकिन अराजक अस्पष्टता के बदले साफ-सटीक नियमन और निगरानी की जरूरत को भी नकारा नहीं जा सकता.

ऑनलाइन खरीदारी की वेबसाइट ‘फ्लिपकार्ट’ ने छह अक्तूबर को ‘बिग बिलियन सेल’ की घोषणा कर केवल एक दिन में छह सौ करोड़ रुपये की बिक्री कर ली थी. उस दिन फ्लिपकार्ट की वेबसाइट पर एक अरब हिट हुए. इस सेल की काट करने के लिए स्नैपडील, अमेजन और इबे जैसी दूसरी वेबसाइट्स ने भी छूट की घोषणा कर दी. स्नैपडील ने दावा किया कि उसने भी छह अक्टूबर को हर मिनट एक करोड़ रुपये की बिक्री की.

भारत में इंटरनेट पर खुदरा बिक्री के लिहाज से ये आंकड़े ऐतिहासिक हैं. लेकिन उसी दिन फ्लिपकार्ट को माफी भी मांगनी पड़ी. आखिर ऐसा क्या हो गया?

दरअसल, उस दिन फ्लिपकार्ट की वेबसाइट पर भीड़ बढ़ गयी तो वेबसाइट अटकने लगी और उस पर खरीदारी का लेन-देन पूरा होने के बदले गलती के संदेश ज्यादा नजर आने लगे. फेसबुक और ट्विटर पर फ्लिपकार्ट के लिए निंदा-अभियान चालू हो गया.

उसे किसी ने फ्लॉपकार्ट, तो किसी ने फेलकार्ट का नाम दे दिया. लोगों की नाराजगी की एक बड़ी वजह यह भी थी कि उसने खरीदारों की भीड़ आकर्षित करने के लिए जिन चुनिंदा सामानों पर बड़ी छूट दी थी, वे मिनटों में ही आउट ऑफ स्टॉक हो गये. इससे बाद में आनेवाले नाराज हुए, इसलिए फ्लिपकार्ट को उनसे माफी मांगनी पड़ी.

लेकिन दूसरी वेबसाइट्स, जैसे स्नैपडील, अमेजन वगैरह के खिलाफ नाराज होनेवालों में केवल खरीदार ही नहीं थे, बल्कि व्यापारी और खुदरा दुकानदारों के संगठन भी थे. छोटे व्यापारियों के साथ विशालकाय खुदरा स्टोर की बड़ी श्रृंखला चलानेवाले किशोर बियानी ने भी विरोध का झंडा उठा लिया था.

व्यापारियों के संगठन कंफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने सरकार से मांग कर डाली कि वह ऑनलाइन व्यापार के नियमन और निगरानी के लिए कदम उठाये. व्यापारियों की मुख्य आपत्ति खुदरा बिक्री करनेवाली वेबसाइट्स द्वारा दी जानेवाली भारी छूट पर है. वे चाहते हैं कि सरकार इनके कारोबारी मॉडल की जांच करे.

किशोर बियानी ने भी यही सवाल उठाया कि भला मिंट्रा कंपनी इतनी ज्यादा छूट पर कपड़े बेच कर हमारे ब्रांड्स को चोट कैसे पहुंचा सकती है? बियानी का मानना है कि लागत से भी कम कीमत पर बेचने की अनुमति हमारे यहां के कानून में नहीं है, इसलिए ऑनलाइन बिक्री करनेवाली वेबसाइट्स पर प्रतिस्पर्धा-विरोधी कदम उठाने का मामला चलना चाहिए. व्यापारिक संगठन ने वाणिज्य और उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमण से मिल कर अपनी बात रखी.

निर्मला से जब मीडिया ने पूछा कि आपको किस तरह की शिकायतें मिली हैं, तो उन्होंने बताया कि ‘हमें कई सूचनाएं (इनपुट) दी गयी हैं. बहुत-सी चिंताएं जतायी गयी हैं. हम इन पर ध्यान देंगे.’ यानी उन्होंने व्यापारियों की बातों को शिकायत मानने से भी संकोच किया!

भारत में कुल खुदरा बाजार सालाना करीब 500 अरब डॉलर यानी 30,000 अरब रुपये से ज्यादा का है. इसमें से ऑनलाइन खुदरा कारोबार अभी सालाना केवल 3.5-4 अरब डॉलर यानी करीब सवा दो सौ अरब रुपये का हुआ है. कुल खुदरा कारोबार के एक बेहद छोटे हिस्से पर इतना बवाल क्यों मचा है?

दरअसल ऑनलाइन खरीदारी की बढ़ती रफ्तार ने किशोर बियानी से लेकर मोहल्ले के छोटे व्यापारी तक के कान खड़े कर दिये हैं. बिग बिलियन सेल जैसे मौके अब अकसर आया करेंगे. यह शुद्ध रूप से अपना धंधा बनाने और बचाने की लड़ाई है. बिग बाजार में सेल के धमाके करने का कोई मौका नहीं चूकनेवाले किशोर बियानी वेबसाइट्स पर चल रही सेल का विरोध कर रहे हैं.

एक खरीदने पर दो मुफ्त की तख्तियां टांगनेवाली दुकानों के संगठन को भी सेल से परेशानी है. दरअसल यह परेशानी उन्हीं का हथियार उन्हीं पर आजमाये जाने की वजह से है. इसीलिए विरोध का बयान देने के चंद दिनों के अंदर किशोर बियानी की कंपनी ने अमेजन की भारतीय इकाई से समझौता कर लिया. अमेजन दुनिया में इंटरनेट पर खरीदारी की अग्रणी अमेरिकी कंपनी है, जो अब भारतीय बाजार में उतर चुकी है.

फ्लिपकार्ट और दूसरी वेबसाइट्स अविश्वसनीय ढंग से छूट कैसे दे रही हैं, यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए. अगर किसी सामान पर 60-70 फीसदी छूट दी जा रही है, तो क्या उसे लागत से कम पर बेचा जा रहा है? या फिर उसकी अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) को जान-बूझ कर इतना बढ़ा कर रखा गया है कि इतनी भारी छूट के बाद भी आप उसे मुनाफे पर बेच पा रहे हैं?

लेकिन यही सवाल तो उन खुदरा दुकानों से भी पूछना चाहिए, जिनमें साल भर ऐसे सेल की तख्तियां लटकी रहती हैं! किशोर बियानी ने दावा किया है कि उनके समूह ने कभी लागत से कम कीमत पर सामान नहीं बेचे. लेकिन क्या सेल के खेल से वे दूर रहे हैं? सेल के खेल का नियमन करने के लिए क्या व्यापारी संगठन मूल्य-नियंत्रण जैसी कोई व्यवस्था चाहते हैं? क्या वे स्वयं अपने ऊपर भी वैसे ही मूल्य-नियंत्रण के लिए तैयार हैं? निर्मला सीतारमण ने अपने शब्दों के चयन में जो सावधानी बरती है, वह अकारण नहीं है.

हालांकि इंटरनेट पर खरीदारी की वेबसाइट्स पर एक गंभीर आरोप यह भी है कि वे खुदरा क्षेत्र में एफडीआइ यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर रोक का उल्लंघन कर रही हैं. इन वेबसाइटों का कहना है कि वे खुद सामान नहीं बेचतीं. वे केवल एक मार्केटप्लेस या मंच उपलब्ध कराती हैं, जहां अलग-अलग विक्रेता आकर अपना सामान बेचते हैं, और इस तरह वे उन विक्रेताओं को अपनी सेवा उपलब्ध कराती हैं.

सूत्रों के हवाले से खबरें आती रही हैं कि फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) के उल्लंघन के आरोप में प्रवर्तन निदेशालय (इडी) ने अमेजन और फ्लिपकार्ट को नोटिस थमा दिया है. यह एक लंबे कानूनी विवाद का मसला बन सकता है. जिस तरह से ऑनलाइन खरीदारी का एक बड़ा बाजार बन चुका है, उसको देखते हुए अमेजन, फ्लिपकार्ट, स्नैपडील जैसी कंपनियां किसी भी कानूनी लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगी.

साथ ही खुदरा व्यापारी संगठन इस बारे में कानूनी अस्पष्टता खत्म करने और विदेशी पूंजी के दम पर चल रही वेबसाइट्स को ऑनलाइन खुदरा व्यापार से हटाने के लिए सरकार पर दबाव बनाते रहेंगे.

मगर एक बात सबको समझनी होगी कि समय का पहिया पीछे नहीं लौटता. तकनीक ने आज एक उत्पादक या विक्रेता और खरीदार के बीच की बहुत-सी कड़ियों को खत्म कर दिया है. इंटरनेट पर खरीदारी आज की हकीकत है और इस पर कृत्रिम बंदिशें लगाने की कोशिशें कामयाब नहीं होंगी, लेकिन अराजक अस्पष्टता के बदले साफ-सटीक नियमन और निगरानी की जरूरत को भी नकारा नहीं जा सकता.

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