आरक्षण के संबंध में महत्वपूर्ण संकेत

समाज के वंचित तबके को नौकरियों में आरक्षण इतिहास में उनके साथ हुए अन्याय की भरपाई के लिए दिया गया है. यह विशेष सुविधा नहीं, बल्कि समाज के थोड़े से सुविधा-संपन्न लोगों के बरक्स सशक्तीकरण के जरूरी उपायों में से एक है, ताकि समाज का वंचित तबका संविधान-प्रदत्त बराबरी के मूल्य के अनुकूल जीवन स्थितियां […]

समाज के वंचित तबके को नौकरियों में आरक्षण इतिहास में उनके साथ हुए अन्याय की भरपाई के लिए दिया गया है. यह विशेष सुविधा नहीं, बल्कि समाज के थोड़े से सुविधा-संपन्न लोगों के बरक्स सशक्तीकरण के जरूरी उपायों में से एक है, ताकि समाज का वंचित तबका संविधान-प्रदत्त बराबरी के मूल्य के अनुकूल जीवन स्थितियां हासिल कर सके.
हालांकि, सिद्धांत रूप में इससे सहमत होने के बावजूद वंचित तबके को उसका जरूरी हक न देने की कोशिशें भी चलती रहती हैं. इसे पंजाब विद्युत बोर्ड के एक उदाहरण से समझा जा सकता है. बोर्ड में अकाउंट ऑफिसर पद पर पिछड़े वर्ग के एक अभ्यर्थी की नियुक्ति को रद्द करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाइकोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि वह ‘क्रीमी लेयर’ के दायरे में आता है.
क्रीमी लेयर की गणना हाइकोर्ट ने पंजाब राज्य के दिशानिर्देशों के अनुरूप की और अभ्यर्थी के माता-पिता की आय के साथ उसमें अभ्यर्थी की आय को भी शामिल किया गया. लेकिन, इस फैसले को निरस्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के एक पत्रांक (1993) का पुनर्पाठ करते हुए कहा है कि क्रीमी लेयर के निर्धारण में अभ्यर्थी के माता-पिता के आय की गणना की जाये, अभ्यर्थी की आय को शामिल न किया जाये.
दरअसल, पिछड़ों के लिए आरक्षण की अवधारणा में आर्थिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि को महत्वपूर्ण माना गया है और सामाजिक बरतरी के लिहाज से जरूरी इन दो बातों का रिश्ता भारतीय समाज में बड़े हद तक जाति से भी जुड़ा होता है, जिसे कोई व्यक्ति स्वयं नहीं चुनता. जातिगत पहचान और परिवेश उसके माता-पिता से तय होते हैं.
जाहिर है, यह देखने के लिए कि किसी को अन्य सबल व्यक्तियों के बराबर बनाने के लिए जरूरी आर्थिक-शैक्षणिक परिवेश हासिल है या नहीं, प्रारंभिक तौर पर उसके माता-पिता की आय और परिवेश की ही गणना की जानी चाहिए. उदारीकरण की वजह से सरकारी नौकरियां लगातार कम हो रही हैं या उनमें निहित सामाजिक सुरक्षा के तत्व कम हो रहे हैं.
इससे समाज के वंचित तबके के लिए सशक्तीकरण के अवसर भी सिकुड़ रहे हैं. ऐसे वक्त में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का एक अहम संकेत यह भी है कि सशक्तीकरण के प्रयासों के लिए निरंतर सतर्क रहना जरूरी है.

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