भूख से मौत मुद्दा क्यों नहीं बनती ?

माननीय मुख्यमंत्री के गृह प्रखंड गोला, रामगढ़ के बेटुल खुर्द गांव के कमलेश मुंडा की भूख से मौत का मामला शांत हो गया. ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार 2003 में कमलेश मुंडा की मां, बहन और पिता संतु मुंडा की भूख से मौत का मामला शांत हो गया था. 2003 में हल्ला हंगामा कुछ अधिक […]

माननीय मुख्यमंत्री के गृह प्रखंड गोला, रामगढ़ के बेटुल खुर्द गांव के कमलेश मुंडा की भूख से मौत का मामला शांत हो गया. ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार 2003 में कमलेश मुंडा की मां, बहन और पिता संतु मुंडा की भूख से मौत का मामला शांत हो गया था.

2003 में हल्ला हंगामा कुछ अधिक हुआ था क्योंकि उस समय एक साथ तीन लोगों की मौत हुई थी. उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने रामगढ़ के एसडीओ से लेकर पंचायत स्तर के आठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया था. ठीक उसी प्रकार हेमंत सोरेन ने भी कुछ अधिकारियों को निलंबित कर दिया और रामगढ़ के अधिकारी कमलेश मुंडा के भाई को पचास किलो चावल और दस हजार रूपया नगद दे कर मामले को शांत कर दिया. लेकिन दोनों मामलों में काफी अंतर है.

संतु मुंडा, उनकी पत्नी और बेटी की मौत के बाद संतु मुंडा के दो पुत्रों को जिला प्रशासन ने गोद लिया था. यानी जिस कमलेश मुंडा की मौत हुई, उसका अभिभावक जिला प्रशासन था. ये बड़ी बेचैन करने वाली बात है कि जिस व्यक्ति की देखरेख की पूरी जिम्मेवारी जिला प्रशासन पर है. उस व्यक्ति की भूख से मौत कई सवाल खड़े करती है. संविधान निर्माताओं ने आदिवासियों की भाषा, संस्कृति, परंपरा आदि की रक्षा के लिए अनुसूचित क्षेत्र की परिकल्पना की थी और झारखंड में यह लागू है.

जब केंद्र सरकार ने आदिवासी हितों की रक्षा के लिए विशेष मंत्रालय की स्थापना की है, आदिवासियों को न्यायलय दिलाने हेतु राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का गठन भी किया है, बावजूद इसके कमलेश मुंडा जैसे लोगों की भूख से मौत के मामले पर किसी ने संज्ञान नहीं लिया और न ही किसी पर मामला दर्ज हुआ, यह सरकारी कार्यशैली पर सवालिया निशान है.

गणेश कुमार वर्मा, हजारीबाग

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