गांधी मैदान में रावण वध के दौरान हुई भगदड़ में 33 लोगों की मौत के बाद ठीक वैसी ही सियासत हो रही है, जैसी इस तरह की हर घटना के बाद होती रही है. इस घटना के बहाने गड़े मुर्दे उखाड़ने की कोशिश भी हो रही है.
विपक्ष ने सीधे-सीधे राज्य सरकार को जिम्मेवार ठहराते हुए उससे इस्तीफा मांगा है. दूसरी तरफ, सत्ता पक्ष का एक हिस्सा इसमें साजिश तलाश रहा है. डर इस बात का है कि गांधी मैदान हादसे पर शुरू हुई घटिया सियासत में असली सवाल कहीं दब न जाएं. पक्ष हो या विपक्ष, आखिर राजनीतिक दल हादसे के बाद ही क्यों जगते हैं? गांधी मैदान के सौंदर्यीकरण का मामला पिछले तीन वर्षो से चल रहा है. गांधी मैदान न किसी सरकार की और न पार्टी विशेष की संपत्ति है.
यह न सिर्फ सार्वजनिक संपत्ति, बल्कि ऐतिहासिक धरोहर भी है. क्या सौंदर्यीकरण के नाम पर इस खुले मैदान को ऊंची-ऊंची दीवारों और उन पर लोहे की छडें लगा कर इसे किसी जेल की तरह बना देने का किसी राजनीतिक दल ने विरोध किया था? हादसे की वजहों में से एक ऊंची दीवारों को भी माना जा रहा है. इसी तरह जब एक निजी निर्माण कंपनी ने गांधी मैदान के एक हिस्से को अपना गोदाम बनाना शुरू किया, तो कितने लोग सड़कों पर उतरे थे? सिर्फ दो-चार सामाजिक संगठन. आज मैदान के गेटों की खस्ताहालत और मैदान के भीतर की प्रकाश व्यवस्था के खराब होने को लेकर सरकार को कोसा जा रहा है, वह कोई एक दिन में नहीं हुआ है. यह तो गांधी मैदान के रखरखाव की बदइंतजामी का प्रकटीकरण है और यह स्थिति लंबे समय से है. किसी दल ने इसे अपना एजेंडा नहीं बनाया.
ऐसे समारोहों में भीड़ के प्रबंधन से लेकर अन्य इंतजामों को सिर्फ सरकार व प्रशासन के भरोसे क्यों छोड़ा जाना चाहिए? दरअसल यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, ऐसे हादसों को रोकने के लिए ठोस कार्य योजना बनाने का है. राजनीतिक दलों को अपनी भूमिका के बारे में नये सिरे से सोचने की जरूरत है. सामाजिक उत्सवों, त्योहारों, हादसों, प्राकृतिक आपदाओं, बढ़ती आबादी से उत्पन्न चुनौतियां और जन जीवन से जुड़े मसलों को अलग-थलग नहीं किया जा सकता है. ऐसे मसलों पर हस्तक्षेप के लिए किसी हादसे का इंतजार क्यों किया जाना चाहिए?
