फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेग्युलेशन) एक्ट के अंतर्गत पंजीकृत दस हजार से ज्यादा स्वयंसेवी संगठन (एनजीओ) विदेश से मिली सहायता राशि का सालाना ब्योरा अब तक जमा नहीं कर पाये हैं. यह सीधे-सीधे वित्तीय पारदर्शिता से जुड़ी जवाबदेही के प्रति लापरवाही का मामला है. गृह-मंत्रालय ने अधिनियम के विधानों के अंतर्गत ऐसे एनजीओ से ठीक ही पूछा है कि क्यों नहीं उनका पंजीयन रद्द कर दिया जाये.
वैसे तो देश में लागू वित्तीय पारदर्शिता संबंधी नियमों से हर किसी का बंधा रहना जरूरी है, लेकिन एनजीओ पर इसकी जिम्मेवारी खास तौर से लागू होती है, क्योंकि आज के समय में नागरिक अधिकारों की रक्षा और उस पर होनेवाले हमलों के प्रति मुखर प्रतिरोध दर्ज करने का जरूरी काम राजनीतिक पार्टियों से कहीं ज्यादा एनजीओ ही कर रहे हैं. ऐसे संगठनों पर सरकारों की नजर टेढ़ी रहती है. यूपीए सरकार ने कुडानकुलाम परियोजना के विस्थापितों के पक्ष में खड़े एनजीओ की आवाज दबाने के लिए हवा बनायी गयी थी कि ये संगठन विदेशी धन के सहारे विकास विरोधी गतिविधियों को अंजाम देते हैं.
अब नयी सरकार ने अपने गठन के बाद इसी लीक पर राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल उठाया और आइबी की रिपोर्ट के हवाले से कहा कि विदेशी धन हासिल करनेवाले कुछ एनजीओ देश की जीडीपी को सालाना 2-3 प्रतिशत का नुकसान पहुंचा रहे हैं. वैसे यह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हो पायी और न ही कोई जान पाया कि उसमें जीडीपी में होनेवाले नुकसान की गणना किस आधार पर की गयी है. विदेशी वित्तीय अंशदान संबंधी ब्योरे दाखिल नहीं करने की बात कह कर तकरीबन साढ़े इक्कीस हजार एनजीओ को नोटिस जारी किया गया. इसमें तकरीबन 4 हजार नोटिस वापस लौट आये, क्योंकि नोटिस के पते पर वे संगठन मौजूद ही नहीं थे.
मतलब, चूक दोतरफा है. अगर एनजीओ वित्तीय लेन-देन के ब्योरे दाखिल करने में लापरवाही बरत रहे हैं, तो सरकार भी कोई खास सतर्क नहीं है. अब जरूरी है कि एनजीओ वित्तीय लेन-देन के ब्योरे देने में कोताही न बरतें, साथ ही यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए वैश्वीकरण के दौर में वैकल्पिक विचारों की वैश्विक साङोदारी कायम करने की दिशा में उठे उनके जरूरी कदमों को बाधा न पहुंचायी जाये.
