मां दुर्गा नारी शक्ति की प्रतीक हैं. स्त्रियां त्याग, करुणा, समर्पण की प्रतिमूर्ति होती हैं. जीवन की हर अवस्था में वह एक नयी जिम्मेदारी का निर्वहन करती है. लेकिन सृष्टि निर्माण के युगों बाद भी नारीत्व को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है तो समाज के सौतेले व्यवहार ने, जहां लड़कों को सोने का सिक्का समझा जाता है तो लड़कियों को खोटा सिक्का.
बेटा कुछ भी करे कोई बात नहीं, लड़की जरा सा कुछ कर दे तो हो-हल्ला होने लगता है. पिछले कुछ वर्षो में लड़कियों के पहनावे पर ढेरों सवाल उठाये गये. छेड़खानी और बलात्कार भी हुए तो लड़की का जींस व स्कर्ट पहनना ही कारण बताया गया. क्या सूट, नकाब या साड़ी इस बात की गारंटी देता है कि लड़की इन सब को पहने तो उसके साथ र्दुव्यवहार नहीं होगा? फिर उन्हें दोष क्यों?
खोट तो हमारी मानसिकता का है. विद्या का मंदिर, जहां लड़के-लड़कियां शिक्षा ग्रहण करने के साथ सभ्यता और नैतिकता का पाठ पढ़ने जाते हैं, वहां भी लड़कियों पर छींटाकशी, छेड़छाड़ की घटनाएं होती हैं. क्यों लड़कियों को घर से निकलने पर तरह-तरह के सवाल पूछे जाते हैं, पर लड़कों से नहीं? सिर्फ इसलिए कि वह परिवार का पालन-पोषण करेगा.
बेटों पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता और अनावश्यक प्यार बेटों को गलत कामों की ओर प्रेरित करता है. परिणाम यह कि बेटा बुढ़ापे में माता-पिता का सहारा नहीं बन पाता है. आये दिन स्त्रियों के साथ तमाम तरह की घटनाएं घटने लगी है. अविश्वास और मैत्रीपूर्ण व्यवहार की कमी के कारण कभी पराये तो कभी अपने ही राक्षसी रूप धारण कर लेते हैं. नवरात्र का यह पावन त्योहार एक अवसर है, जब हम स्त्रियों के सम्मान तथा सुरक्षा के लिए शपथ ले सकते हैं. नारी कमजोर नहीं है. उसे बस हमारे मानसिक सहयोग की जरूरत है.
सुधीर कुमार, गोड्डा
