मंगल पर फतह में छिपे जरूरी संदेश

मंगल ग्रह की टोह लेने के लिए अंतरिक्ष-यान जब बीते साल रवाना हुआ था, उस वक्त इस अतिमहत्वाकांक्षी भारतीय मिशन के आलोचक कह रहे थे कि जिस काम में अमेरिका व रूस जैसे अंतरिक्ष-प्रौद्योगिकी के दिग्गजों के छक्के छूट चुके हैं, वहां भारत की क्या बिसात. लेकिन, अमंगल की आशंकाओं को धता बताते हुए 300 […]

मंगल ग्रह की टोह लेने के लिए अंतरिक्ष-यान जब बीते साल रवाना हुआ था, उस वक्त इस अतिमहत्वाकांक्षी भारतीय मिशन के आलोचक कह रहे थे कि जिस काम में अमेरिका व रूस जैसे अंतरिक्ष-प्रौद्योगिकी के दिग्गजों के छक्के छूट चुके हैं, वहां भारत की क्या बिसात.

लेकिन, अमंगल की आशंकाओं को धता बताते हुए 300 दिनों में तकरीबन 67 करोड़ किलोमीटर की यात्र कर ‘मंगलयान’ लाल ग्रह के परिपथ में स्थित होकर वहां से तसवीरें भेजने लगा है. अमेरिका, रूस और यूरोप के बाद मंगल ग्रह को नजदीक से निहारनेवाला भारत विश्व का चौथा और एशिया का पहला देश बन गया है.

इस दुर्गम यात्र को पहले ही प्रयत्न में लांघने वाला भारत अकेला देश है. ऐसी शानदार उपलब्धि महज 450 करोड़ रुपये खर्च कर हासिल की गयी है, जबकि मंगल ग्रह तक पहुंचने के अमेरिकी मिशन में इससे दस गुना ज्यादा रकम खर्च हुई है. मंगल मिशन की कामयाबी इस तथ्य का ठोस रेखांकन है कि भारतीय प्रतिभा संसाधनों की सीमितता के बावजूद अपने संकल्प और समुचित प्रबंधन के बूते कोई भी ऊंचाई छू सकती है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) को शोध और प्रबंधन में स्वायत्तता प्राप्त है.

हालांकि उसे भी संसाधनों की जरूरत है, पर उसे शासन का संरक्षण प्राप्त है. साथ ही, स्वायत्तता के कारण वह राजनेताओं और नौकरशाहों के बेजा व बेमानी दखल से भी मुक्त है. इसका सकारात्मक नतीजा है कि इसरो की परियोजनाएं सफल होती रही हैं और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भारत अग्रणी देशों में शुमार है. दूसरी ओर देश में कई ऐसे शोध संस्थान भी हैं, जिनकी स्वायत्तता सिर्फ कागजी है. मंगल मिशन की कामयाबी से सीख लेते हुए सरकार और समाज को हमारी शोध-संस्थाओं के मौजूदा स्वरूप में बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए.

यदि भारत के अन्य शोध संस्थानों को भी इसरो की तरह ही समुचित आर्थिक व नीतिगत समर्थन दिया जाये, तो वहां भी प्रतिभाएं महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर सकती हैं. अफसोस की बात है कि उच्चस्तरीय शोध को बढ़ावा देने की कोई स्पष्ट नीति अभी सरकारों के पास नहीं है. हमें इस तथ्य को गांठ बांध लेना होगा कि उत्कृष्ट शोध को प्रोत्साहित किये बगैर देश का चहुंमुखी विकास संभव नहीं है.

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