बुधवार को आजसू और एबीवीपी अपनी-अपनी मांगों को लेकर रांची में सड़कों पर उतरे. दोनों संगठनों की मांगें भले ही अलग-अलग हों, लेकिन ये झारखंड के छात्रों, बेरोजगारों और यहां के लोगों से जुड़ी हैं. राज्य बने 14 साल हो गये हैं और इतने समय में इन समस्याओं का निदान हो जाना चाहिए था. सरकार बदलीं, लेकिन समस्याएं जस की तस रहीं. हर दल की सरकार रही. सभी को मौका मिला, लेकिन किसी भी सरकार ने इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया.
आजसू की मांग है आंदोलनकारियों को सम्मान देना, स्थानीय नीति बनाना, कानून-व्यवस्था की स्थिति ठीक करना, अपनी पार्टी के दो नेताओं की हत्या के मामले की जांच कराना, बालू घाटों की नीलामी रद्द करना. आंदोलनकारियों को नौकरी-सम्मान देने के प्रति सरकार की बहुत रुचि नहीं दिखती है. आयोग ने कई नामों की अनुशंसा की, लेकिन काम आगे नहीं बढ़ा. झामुमो आंदोलन की पार्टी है और अगर वही रुचि न ले तो कोई भी दल झारखंड आंदोलनकारियों का भला नहीं कर सकता. जो होना होगा, इसी सरकार में होगा. स्थानीय नीति ऐसा मुद्दा है जिसमें कोई भी दल हाथ नहीं जलाना चाहता.
सभी की वोट बैंक की राजनीति है. ऐसे प्रदर्शनों से सरकार पर बहुत असर नहीं पड़ता. जो काम करने की इच्छा होगी, वह तो हो ही जायेंगे, लेकिन गंठबंधन की सरकार में बहुत कुछ किया नहीं जा सकता. विद्यार्थी परिषद का प्रदर्शन छात्रों के हित को लेकर था. छात्रों ने पुलिस की मार भी खायी.
छात्रों को छात्रवृत्ति नहीं मिल रही, छात्रवासों की स्थिति खराब है, कॉलेजों में पर्याप्त संख्या में शिक्षक नहीं हैं. सरकार चाहती तो इन समस्य़ाओं का हल निकल सकता था. यह सरकार का काम है. पैसा है, पैसा लौट जाता है. लेकिन सिस्टम इतना अस्त-व्यस्त है कि छात्रों का काम नहीं होता. शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं. ऐसे में कॉलेजों में बेहतर पढ़ाई नहीं हो रही. जब पढ़ानेवाले नहीं होंगे, तो ये लड़के कैसे प्रतियोगी परीक्षाओं में पास करेंगे. सवाल छात्रों के भविष्य का है. इसलिए मजबूरी में उन्हें सड़क पर उतरना पड़ा. अब सरकार को संवेदनशील होना होगा. जिन मामलों को लेकर प्रदर्शन हुए हैं, उन पर ध्यान देना होगा. अगर सरकार इसे ठीक कर लेती है, तभी सरकार की उपलब्धि होगी.
