आ गया शारदीय नवरात्र. नवरात्र में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होगी. साथ ही सभी मनोकामनाओं को पूरा करने का अवसर भी है. ऐसी मान्यता है कि इस पूजा के दौरान शुद्ध मन से जो भी मन्नत मांगी जाये, मां दुर्गा उसे पूरा करती हैं. इसके साथ ही त्योहारों का मौसम भी शुरू हो गया है. लेकिन इन सबके के अलावा एक मौसम और भी साथ-साथ चल रहा है और वह है चुनावी मौसम.
अगले कुछ माह में झारखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में राजनेता और कार्यकर्ता अपने मन की मुराद पूरा करने के लिए जी-जान से जुटे हैं. इसी क्रम में दिल्ली से लेकर झारखंड में बैठकों का दौर जारी है. दरअसल चुनावी मौसम के आते ही विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से इस तरह की एक्सरसाइज शुरू हो जाती है. सभी पार्टियां इस प्रयास में जुट जाती हैं कि कैसे सत्ता हासिल हो. इसके लिए तमाम हथकंडे अपनाये जाते हैं. इसी का परिणाम है कि भारतीय राजनीति में गंठबंधन और महागंठबंधन जैसी बातें सामने आती हैं.
ऐसा इसलिए होता है कि पार्टियों को अकेले अपने बूते चुनाव जीतने पर भरोसा नहीं होता. इसलिए एकला चलो की जगह सब साथ चलो की नीति पर धड़ल्ले से काम हो रहा है. झारखंड में भी ऐसा ही देखने-सुनने को मिल रहा है. कांग्रेस जैसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी भी राज्य में सत्ता पाने के लिए अपने से छोटे क्षेत्रीय दलों के साथ गंठबंधन करना चाहती है. कांग्रेस ने झामुमो के साथ महागंठबंधन बना कर चुनाव लड़ने का एलान किया है. इसमें राजद और जदयू जैसे दल भी शामिल रहेंगे. बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व वाले झाविमो को इसमें शामिल नहीं किया गया है.
यह निर्णय अकेले नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से लिया गया. महागंठबंधन में शामिल तमाम दलों के सांसदों, विधायकों और नेताओं की सहमति ली गयी. हालांकि यह गंठबंधन कितना कारगर होगा, अभी इस पर टिप्पणी करना जायज नहीं है. लेकिन सवाल तो खड़े होते ही हैं. अभी गंठबंधन के स्वरूप पर चर्चा होगी और यहीं से शुरू होगी अग्निपरीक्षा. महागंठबंधंन का नेता कौन होगा. कौन-सी सीट पर कौन प्रत्याशी होंगे. कब तक प्रत्याशियों के नामों पर अंतिम मुहर लगेगी. ये कुछ ऐसे यक्ष प्रश्न हैं, जिनका जवाब त्योहारों के इस मौसम में जनता जानना चाहती है.
