धारावाहिकों में बदलाव की जरूरत

आजकल टीवी सीरियल बड़े ही नीरस और बेजान हो गये हैं. वही घिसी-पिटी सास-बहू की कहानी, वही बहुओं की चालें और सास की ज्यादतियों का किस्सा. वही पहली के बाद दूसरी शादी. ऐसे धारावाहिक देखते-देखते लोग बोर हो गये हैं. वर्षो तक एक ही परिवार की कहानी कैसे आंखों के सामने सजीव रहेगी? न तो […]

आजकल टीवी सीरियल बड़े ही नीरस और बेजान हो गये हैं. वही घिसी-पिटी सास-बहू की कहानी, वही बहुओं की चालें और सास की ज्यादतियों का किस्सा. वही पहली के बाद दूसरी शादी. ऐसे धारावाहिक देखते-देखते लोग बोर हो गये हैं. वर्षो तक एक ही परिवार की कहानी कैसे आंखों के सामने सजीव रहेगी?

न तो कथानक में कोई नवीनता है और न ही छोटे परदे पर नये चेहरे उभर रहे हैं. ऊपर से प्रसारण के शुरू के पांच मिनट पहले क्या हुआ, इसे दिखाने में बीत जाते हैं. दस से पंद्रह मिनट विज्ञापन खा जाते हैं. अब बचा क्या, आधे घंटे के धारावाहिक में देखने के लिए? इसलिए पढ़ा-लिखा तबका और आज की पीढ़ी अब अंगरेजी चैनलों की तरफ रु ख कर रही है. डिस्कवरी और एनिमल प्लैनेट पर उसे काफी रोचक और ज्ञानपरक जानकारी प्राप्त होती है. हिंदी धारावाहिकों में कुछ नयापन लाने की जरूरत है.

बज्र मोहन, नयी दिल्ली

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