अवधेश कुमार
वरिष्ठ पत्रकार
awadheshkum@gmail.com
संसदीय लोकतंत्र का मूल आधार राजनीतिक दल हैं. भारत की नियति इन राजनीतिक दलों के चरित्र पर ही निर्भर है. आखिर सरकार चलाने के लिए लोग राजनीतिक दलों के नेताओं का ही निर्वाचन करते हैं.
राजनीतिक नेतृत्व लोकतंत्र की मूल भावना के अनुरूप काम न करे, तो फिर देश का स्वस्थ, संतुलित और समुचित विकास दुष्प्रभावित होगा. दल यदि आपस के वैचारिक मतभेदों के रहते हुए भी समय के अनुसार देशहित में एकजुट नहीं हो सकते, तो फिर देश के भविष्य को लेकर चिंता स्वाभाविक है. क्या हमारी राजनीति इस दुरावस्था का शिकार हो चुकी है? इसका उत्तर आप जानते हैं.
चुनाव में आमना-सामना होना, एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना, एक-दूसरे को हराने की कोशिश करना आदि किसी भी लोकतंत्र की स्वाभाविक स्थिति है. इनसे किसी को कोई आपत्ति होनी नहीं चाहिए.
ये गतिविधियां लोकतंत्र को जीवंत बनाती हैं, लेकिन अगर हम थोड़ी गहराई से देखें, तो भारत की राजनीति धीरे-धीरे पक्ष और विपक्ष की सामान्य प्रतिस्पर्धा से बाहर निकलकर दुश्मनी एवं एक-दूसरे से घृणा और अंतिम सीमा तक असहयोग की स्थिति में परिणत हो रही है. यह स्थिति डरावनी है. कोई भी राजनीतिक दल हो, उसको समझना होगा कि अंततः उसे देश के लिए काम करना है. राजनीतिक दलों की कल्पना जनसेवा-देशसेवा के संदर्भ में ही की गयी थी.
इस नाते संसदीय लोकतंत्र में राजनीति एक श्रेष्ठ कर्म है. जाहिर है इसकी श्रेष्ठता तभी कायम रहेगी, जब नेताओं की भूमिका उसके अनुकूल हो. साल 2019 इस मायने में भी दुर्भाग्यशाली कहा जायेगा कि राजनीतिक दलों के बीच बढ़ती दूरियां घटने की बजाय और ज्यादा बढ़ी हैं. आप देखिए कि नेता एक-दूसरे के विरुद्ध, एक-दूसरे की पार्टी और संगठन के विरुद्ध किस प्रकार के शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं. राजनीति की भूमिका देश को दिशा देने की भी है. आम जनता को देश के लिए काम करने, अच्छा काम करने, आपस में मिलजुल कर रहने, शांति और सद्भाव कायम करने की प्रेरणा देने और इन सबमें नेतृत्व करने की भूमिका भी राजनीतिक दलों की ही है.
आज हम साल 2020 में प्रवेश कर रहे हैं, तो यह विचार करना जरूरी है कि क्या इस समय जो भी राजनीतिक दल हैं, जो नेता राष्ट्रीय और प्रदेश स्तरों पर हमें दिखाई दे रहे हैं, क्या उनको इन कसौटियों पर खरा माना जा सकता है? यह प्रश्न आज हर उस व्यक्ति को खुद से पूछना चाहिए, जो देश में लोकतंत्र के भविष्य को बेहतर बनाना चाहता है.
आजादी की लड़ाई के हमारे मनीषियों ने भारत की कल्पना एक ऐसे देश के रूप में की थी, जो दुनिया के लिए प्रेरणा बनेगा. वे मानते थे कि आजाद भारत दुनियाभर को संघर्ष, दमन और शोषण से मुक्ति के लिए रास्ता दिखायेगा.
जाहिर है, ऐसे भारत का निर्माण राजनीतिक दलों के व्यवहार से ही संभव हो सकता है. अगर राजनीतिक दलों को देश तथा आम जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी का संपूर्ण एहसास नहीं है, तो विश्व के प्रति भी अपने दायित्व का उनको एहसास नहीं हो सकता. मूल बात यह है कि हम देश के बड़े लक्ष्यों का ध्यान रखते हुए किस तरह अपनी वाणी और आचरण को संयमित रख सकें. देश में या प्रदेश में कोई भी सरकार हो, आखिर भारत के राजनीतिक दलों की ही सरकार है, इसलिए उनके साथ हमारा संघर्ष एक सीमा तक ही संभव हो सकता है. केंद्र व प्रदेश की सरकारें विदेशियों की नहीं हैं कि हमें उनको उखाड़ फेंकने के लिए संघर्ष करना है.
सत्ता पक्ष और विपक्षी दलों को सोचना पड़ेगा कि सब हमारे ही भाई-बहन हैं, हमारे राजनीतिक प्रतिस्पर्धी हैं, दुश्मन नहीं. किसी मसले पर जब कोई रास्ता न निकल पाए या मुश्किल आए, तो राजनीतिक रूप से मान्य अहिंसक तरीकों से उसका सामना करना चाहिए. किसी भी लोकतांत्रिक संघर्ष में एक-दूसरे के लिए अपमानजनक और अश्लील शब्दों के प्रयोग का कोई स्थान नहीं है.
जब 2019 में हमारी राजनीति ने अपनी सोच, अपने वक्तव्यों और व्यवहारों में इस तरह के सकारात्मक परिवर्तन का संकेत नहीं दिया है, तो हम 2020 के लिए आश्वस्त कैसे हो सकते हैं!
बावजूद इसके, हर एक भारतवासी का दायित्व है कि वह इसके लिए कोशिश करे. राजनीति को स्वाभाविक धरातल पर लाने के लिए जितना भी संभव हो, काम किया जाए. इस संकल्प के साथ हमें साल 2020 में प्रवेश करना चाहिए, लेकिन भारत की समस्या है कि यहां नागरिकों का एक बड़ा वर्ग राजनीति और लोकतंत्र के बारे में यह सोच कर चलता है कि इससे हमारा क्या लेना-देना.
भारतीय समाज के इस सामूहिक चरित्र में बदलाव की आवश्यकता है. राजनीति हमारे जीवन के प्रत्येक कर्म को प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभावित करती है. चूंकि नेताओं को मतदाताओं के मत से निर्वाचित होना है, इसलिए एक मतदाता के नाते हमारी भूमिका है कि हम बेहतर लोगों के पक्ष में मतदान करें. वास्तव में राजनीति को बेहतर करने के लिए जितना भी संभव हो, हमें काम करना होगा. जो नेता भाषा और व्यवहार में मर्यादा का उल्लंघन करता है, उनको मजबूर करें कि मर्यादा की सीमा रेखा में आएं.
जो नहीं आते, हम उनको नकारें. जो नेता, जो पार्टी वक्तव्य और व्यवहार में लोकतांत्रिक मर्यादा का पालन करते हैं, उनको हम प्रोत्साहित करें. यही समय की मांग है. कोउ नृप होय हमें का हानि का सामाजिक व्यवहार राजनीति को निरंकुश बना देता है. भारतीय राजनीति के क्षरण का यह एक बड़ा कारण है. साल 2020 के आगमन पर हमेें इस दिशा में सक्रिय होना चाहिए.
